सड़क दुर्घटनाओं में मरने और घायल होने वालों की संख्या में जहां तक जानकारी मिलती है निरंतर इजाफा हो रहा है। आखिर सरकार हर साल सड़क सुरक्षा सप्ताह और दुर्घटनाओं को रोकने के नए नए उपाय कर रही है फिर भी ऐसा क्यों होता है ध्यान से सोचने पर जो महसूस होता है वह यह है कि एक तो सरकार हेल्मेट और वाहन चलाने के नियमों का सही पालन कराने के बजाये जबरदस्ती की सख्ती और नागरिकों पर इससे संबंध लोग जो ज्यादती करते हैं तथा बिना क्षेत्र के नागरिकों के सलाह मशविरा बिना रास्ता रोक देना जब चाहे कहीं भी कट बंद कर देना इनके लिए आम बात हो गयी है लेकिन दुर्घटनाओं के लिए असली कारण टूटी फूटी सड़कें और उनमें गढ्ढे उनमें सुधार इस स्तर पर नहीं हो पा रहा जितना होना चाहिए। सड़क पर खड़े होकर ट्रेफिक पुलिस वाले चालन तो करेंगे लेकिन जिम्मेदारों को यह नहीं बतायेंगे की वाहन चालकोे के सामने क्या क्या समस्याएं आ रही हैं सड़कों के चौड़ीकरण और पैदल मार्ग तथा बीच में आवागमन के सुचारू व्यवस्था के लिए पतली सी लाइनें खड़ी की जाती है जिनमें वृक्ष आदि लगाने की घोषणाएं की जाती है इस नाम पर पैसा तो खूब खर्च होता है मगर इसके अनुसार सुधार नहीं होता इसके उदाहरण के रूप में पिछले एक दशक में जितना बजट सरकार का इन कामों पर खर्च हुआ उसकी समीक्षा कर आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है मेरा मानना है कि सड़कों के बीच जो डिवाइडर तो बने लेकिन वह इतने चौंड़े हो जो आधी सड़क न घेरकर अपने मूल उद्देश्य आने जाने का मार्ग बना सकें दूसरे हर दो तीन वर्ष में जो चौराहों के सौंदर्यकरण के प्लान बनते है यह प्लान कम बजट हजम करने के माध्यम होते हैं इसका जीता जागता सबूत के रूप में शहरों में जिन चौराहों का सौंदर्यकरण होता है उनकी स्थिति और खर्च की समीक्षा कर कोई भी जान सकता हैं। मेरा मानना है कि हर चौराहे और तिराहे पर ऐसे स्पीड ब्रेकर बनाये जायें जो दूर से ही नजर आते हों क्योंकि तेजी से आ रहे वाहन कभी कभी कोई चिन्ह ना होने की वजह से भी दुर्घटना का कारण बन जाते हैं।
हम नागरिकों की इस राय से सहमत है कि सड़क परिवहन और केंद्रीय ग्रह मंत्रालय इसके लिए संयुक्त समिति बनाये जो अपने आप को गहन समीक्षा दुर्घटना के कारणों की करे ही हर गांव शहर और देहात में नागरिकों की समितियां बनायी जाये और उनसे सुझाव लेकर ऐसी नीति बनायी जाये जो हर दो तीन वर्ष में सड़कों के चौड़ीकरण और सौन्दर्यकरण पर विकास और जनहित की योजनाओं में काम आने वाले धन की बचत हो सके क्योंकि सिर्फ डंडे और चालन से यह व्यवस्था सुधरने वाली नहीं पिछले दो तीन दशक की व्यवस्थाओं को देखकर यही लगता है कि और वैंसे भी अब यह समझना होगा कि सिर्फ डर दिखाकर या हेल्मेट जैसी व्यवस्था सुधार हो पाना संभव नहीं है। नागरिकों को प्यार से जब यह समझाया जायेगा कि किस बात का क्या नुकसान हो सकता है तभी कुछ अच्छे परिणाम आएंगे सिर्फ हेल्मेट बनाने वाली कंपनियों को अनकहे रूप से लाभांवित कर और चालान कर जुर्माना वसूलने से कुछ नहीं होने वाला लगता है।
वर्तमान समय में बच्चों में समझ बूझ जाते हैं और बड़े भी हो रहे है मगर वाहन चलाने का लाइसेंस ना होने की सिपाही को देखते ही इधर उधर भागते हैं यह भी दुर्घटनाओं में बढ़ोत्तरी का कारण है इसलिए मेरा मानना है कि वाहन चलाने में सक्षम 15 वर्ष के बच्चों को भी लाइसेंस दिया जाये जिससे वह डरकर नहीं जिम्मेदारी से अपनी यात्रा पूरी करें।
(प्रस्तुति:- अंकित बिश्नोई सोशल मीडिया एसोसिएशन एसएमए के संस्थापक राष्ट्रीय महामंत्री मजीठिया बोर्ड यूपी के पूर्व सदस्य संपादक पत्रकार)
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