नई दिल्ली, 06 मई (ता)। भगवान शिव का निवास स्थान माने जाने वाला कैलाश पर्वत सिर्फ आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे गहरे रहस्यों में से एक है। सोचने वाली बात है कि जिस इंसान ने माउंट एवरेस्ट जैसी दुर्गम चोटी पर हजारों बार कदम रखे हैं, वो उससे 2,000 मीटर छोटे कैलाश पर्वत के सामने क्यों हार मान लेता है?
आखिर इस 6,638 मीटर ऊंचे रहस्यमयी पर्वत पर ऐसा क्या है जो इसे आज तक अजेय बनाए हुए है? इसके पीछे सिर्फ धार्मिक भावनाएं ही नहीं, बल्कि भूगोल से जुड़े भी कई कारण हैं, जो विज्ञान को भी हैरान करते हैं। आइए जानें क्यों आज तक कोई कैलाश पर्वत पर नहीं चढ़ पाया है।
कैलाश पर्वत हिंदू, बौद्ध, जैन और बोन धर्म में बेहद पवित्र माना जाता है। हिंदू धर्म में इसे भगवान शिव का निवास स्थान माना जाता है। जैन धर्म के अनुसार पहले तीर्थंकर ऋषभदेव ने यहीं निर्वाण प्राप्त किया था। बौद्ध धर्म में इसे शांति का प्रतीक माना जाता है और बोन धर्म में इसे अध्यात्मिक दुनिया का केंद्र माना जाता है।
इन धर्मों की मान्यता है कि पर्वत पर चढ़ना देवताओं के निवास स्थान का अपमान करना है। इसी कारण चीन सरकार ने इस पर चढ़ाई करने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा रखा है।
कैलाश पर्वत की आकृति एक पिरामिड की तरह है, जिसके चारों मुंह चारों दिशाओं में बिल्कुल सटीक हैं। वैज्ञानिकों के लिए यह आज भी एक पहेली है कि प्राकृतिक रूप से कोई पहाड़ इतना सिमेट्रिकल कैसे हो सकता है। इसके पीछे टैक्टोनिक फोर्सेज और हवा के कटाव को जिम्मेदार माना जाता है।
इसके अलावा, इसकी ढलानें बेहद खड़ी और चट्टानी हैं, जहां बर्फ का टिकना मुश्किल है। लगातार चलने वाली बर्फीली हवाएं और ऑक्सीजन की भारी कमी कैलाश पर्वत की चढ़ाई काफी मुश्किल बनाती हैं।
कैलाश पर्वत से जुड़ी कई कहानियां भी प्रचलित हैं। कहा जाता है कि इस क्षेत्र में पहुंचते ही समय तेजी से बीतने लगता है। यहां तक कि लोगों के नाखून और बाल कुछ ही घंटों में इतने बढ़ जाते हैं, जितने आमतौर हफ्तों में बढ़ते हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि यहां पहुंचने वाले पर्वतारोही अक्सर अपना रास्ता भटक जाते हैं; उन्हें महसूस होता है कि वे शिखर की ओर बढ़ रहे हैं, लेकिन वे फिर वापस नीचे ही आ जाते हैं।
कैलाश के तलहटी में दो झीलें हैं जो दो अलग-अलग ऊर्जा का प्रतीक मानी जाती हैं-
मानसरोवर- ताजे पानी की झील, जो पवित्रता और सकारात्मकता का प्रतीक है।
राक्षस ताल- खारे पानी की झील, जहां कोई जीवन नहीं है और इसे नकारात्मकता से जोड़ा जाता है।
हैरान करने वाली बात है कि इन दोनों झीलों के बीच की दूरी बहुत कम है, लेकिन इनका स्वभाव एक-दूसरे से बिल्कुल अलग है।
क्योंकि शिखर पर चढ़ना वर्जित है, श्रद्धालु इसकी कोरा या परिक्रमा करते हैं। यह 52 किलोमीटर का मुश्किल रास्ता है। माना जाता है कि इसकी एक परिक्रमा करने से जीवन के सभी पाप धुल जाते हैं।
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