मेरठ 02 जून (प्र)। सरकार की ओर से स्वास्थ्य सेवाओं में किए जा रहे बदलाव का चिकित्सक विरोध करने लगे हैं। चिकित्सकों का आरोप है कि छोटे व मध्यम निजी अस्पतालों के लिए एनएबीएच एक्रीडिटेशन को अनिवार्य किया जा रहा है। उनका कहना है कि इसके लागू होने पर 60 फीसदी अस्पताल तो बंद ही हो जाएंगे। इनमें मिलने वाला उपचार भी आयुष्मान के मरीजों नहीं मिल पाएगा।
नीमा की ओर से प्रमुख सचिव स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण को पत्र लिखकर एनएबीएच के सर्टिफिकेशन को अनिवार्य न करने की मांग की है। नीमा के अध्यक्ष डॉ. नागेंद्र ने बताया कि अधिकांश छोटे खर्चे बढ़ जाएंगे, जिसे छोटे अस्पताल वहन अस्पताल सीमित संसाधनों, कम स्टाफ, बढ़ती महंगाई एवं आर्थिक दबाव बावजूद ग्रामीण एवं अर्ध-शहरी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करा रहे हैं। नई व्यवस्था से खर्च बढ़ जाएंगे, जिसे छोटे अस्पताल वहन करने की स्थिति में नहीं हैं। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि राज्य के अनेक सरकारी अस्पताल स्वयं अभी तक एनएबीएच एक्रीडिटेशन से अछूते हैं।
चिकित्सकों की मुख्य मांगें
छोटे एवं मध्यम निजी अस्पतालों पर एनएबीएच एक्रीडिटेशन को अनिवार्य न किया जाए। किसी भी गुणवत्ता सुधार नीति को को चरणबद्ध एवं व्यावहारिक रूप में लागू किया जाना चाहिए। सरकारी एवं निजी संस्थानों के लिए समान मानक लागू होने चाहिए। छोटे अस्पतालों को आर्थिक सहायता, सब्सिडी एवं तकनीकी सपोर्ट उपलब्ध कराया जाए। किसी भी प्रकार की दंडात्मक कार्यवाही अथवा लाइसेंस संबंधी दबाव एनएबीएच के नाम पर न बनाया जाए।

