समाज से लेकर पढ़ने की क्लास तक पांच से १९ साल के नौ करोड़ बच्चे विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार सुनने की क्षमता में कमी का शिकार हो रहे हैं। कम सुनाई देना कई बीमारियों का कारण बन सकता है। लेकिन इसके इलाज पर ध्यान दिया जाना चाहिए लेकिन यह बिल्कुल नहीं सोचा जाना चाहिए कि आवाज कम आ रही है तो हम जीवन में कुछ नहीं कर सकते। अगर माताएं बचपन से बच्चों के कान में पानी ना जाए, कान बह रहा है या मैल जमने पर उसकी सफाई और इलाज की ओर ध्यान दे तो शायद कम सुनने वालों बच्चों की संख्या में कमी आ सकती है। आज हम विश्व श्रवण दिवस मना रहे हैं। रोज ही कोई ना कोई दिवस होता है। उस दिन डॉक्टर और नागरिक सुझाव और समाधान के साथ इलाज बताते हैं। फिर भी यह समस्याएं बढ़ती ही जा रही है। ऐसा क्यों हो रहा है सोचा गया तो समझ में आया कि एक दिन कोई दिवस मना लेने से किसी समस्या का समाधान और बीमारी खत्म नहीं होती। इसका भी समाधान होने वाला नहीं है। मुझे लगता है कि बीमारी का पूर्ण समाधान हो तो हमें बचपन से ही बच्चों को जागरुक करना होगा। यह घर में होना आसान नहीं है। हम मोटी फीस देकर स्कूलों में बच्चों को भेजते हैं। प्रवेश के समय स्कूल संचालकों से यह आग्रह करे कि माह में एक बार बच्चों की काउंसिलिंग हो। बच्चों की समस्याओं से अभिभावको को अवगत कराया जाए तो इस समस्या का भी समाधान हो सकता है। इसके साथ ही हर स्कूल में एक योग्य डॉक्टर की नियुक्ति हो जो स्कूल बंद होने तक वहां रहे। तो बच्चों में बीमारियां पनपने से पहले की समाप्त हो सकती है।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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