सरकार हर स्तर की शिक्षा को जितना सुविधाजनक और आम आदमी की पहुंच में पारदर्शी बनाने के प्रयास कर रही है उतना ही इस संदर्भ में पढ़ने को मिलने वाली खबरों से जो पता चलता है उससे लगता है कि स्कूलों को कमाई का अड्डा बनाने में लगे कुछ सफेदपोश शिक्षा माफिया और उनके संस्थानों में क्या गतिविधियां चल रहीं हैं हापुड़ की मोनार्ड यूनिवर्सिटी के बाद अब आठ राज्यों के बीस फर्जी विश्वविद्यालय की संख्या बढ़कर अब ३२ हो गयी। एक खबर के अनुसार इनके हौंसले कितने बुलंद हैं कि फर्जी विद्यालयों के साथ ही अब इनके और के आविष्कारों को भी कुछ लोग अपने बताने लगे। इनकी संख्या क्यों बढ़ रही है और इन पर रोक क्यों नहीं लग पा रही यह तो जिम्मेदार ही जाने लेकिन विदेशी विश्वविद्यालयों के साथ अपने अनुबंध का चोला ओढ़कर आगे बढ़ रहे कई विश्वविद्यालयों के घपले खुलकर सामने आ सकते हैं क्योंकि कोई नामचीन कॉलेज डाक्ट्रेट की फर्जी उपाधि बांट रहा है तो कोई औरों के आविष्कार को अपना बताकर वाह-वाही लूटने की कोशिश कर रहा है इसके उदाहरण स्वरूप देश की राजधानी दिल्ली में आयोजित एआई इम्पैक्ट सीमिट के अंदर नामीग्रामी यूनिवर्सिटी गलगोटिया के छात्रों द्वारा चीन की कंपनी यूनिट्री रोबोटिक्स का उत्पादन अपना बताकर समिट में पहुंच गये जांच में खुलासा होने पर उन्हें बेइज्जती के साथ बाहर आना पड़ा। एक चर्चित प्रकरण के विरूद्ध समाजवादी पार्टी के विधायक सचिन यादव व पंकज मलिक ने नोएडा की गलगोटिया जिस विश्वविद्यालय के प्रकरण को उठाते हुए गहराई से इसकी जांच कराने तथा इस यूनिवर्सिटी की मान्यता रद करने की मांग की गयी। मां-बाप अपने बच्चों को इन प्राईवेट यूनिवर्सिटियों में मोटी फीस देकर इसलिए पढ़ने भेजते हैं कि यह अपनी साख व पढ़ाई का स्तर बनाये रखने के प्रयास करते हैं मगर गलगोटिया जैसी प्रसिद्ध विद्यालय के छात्रों के इस क्रियाकलाप ने सारे दिव्य स्पप्न तोड़कर रख दिये क्योंकि बच्चों के भविष्य से जुड़े इस विद्यालय का कारनामा यह सिद्ध करता है कि सब ना सही कई प्राईवेट संस्थान पैसा कमाने का अड्डा अपने विश्वविद्यालय को बनाते जा रहे लगते हैं।
पिछले वर्ष विश्वविद्यालय कालेजों को रैंक देने वाले संस्था के अध्यक्ष मोटी रिश्वत लेते पकड़े गये थे तब भी इस प्रकार के बिन्दु उठे थे इनमें जागरूक नागरिकों का कहना था कि सरकार इन शिक्षा के संचालकों पर शिकंजा कसे और जिन-जिन के नाम खुलकर सामने आये उनकी मान्यता रद्द करें। पहले मोनार्ड और गलगोटिया आखिर कब तक बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ करते और करवाते रहेंगे। यह सोचनीय विषय है क्योंकि चीन के बने उत्पाद को अपना बताकर छात्र बिना प्रोफेसर और संबंधित प्रोफेसर और विश्वविद्यालय के उच्च पदों पर बैठे व्यक्तियों की बिना सहमति के ऐसा नहीं कर सकते थे। मेरा मानना है कि गलगोटिया जैसे विश्वविद्यालयों की मान्यता निरस्त कर एक ईमानदार प्रोफेसरों की समिति बनाकर देश भर के विश्वविद्यालयों के कार्यों की कार्यप्रणाली की जांच कराई जानी चाहिए।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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