वाराणसी 21 फरवरी। इस वर्ष फाल्गुन पूर्णिमा पर होलिका दहन और रंगोत्सव के बीच चंद्रग्रहण के कारण तिथि और मुहूर्त को लेकर विशेष स्थिति बन गई है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार होलिका दहन दो मार्च की रात्रि में होगा, जबकि रंगोत्सव ( धुरड्डी) तीन मार्च के बजाय चार मार्च को मनाया जाएगा।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय के ज्योतिष विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. विनय कुमार पांडेय के अनुसार फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा दो मार्च को शाम 5:21 बजे से शुरू होकर तीन मार्च को शाम 4:34 बजे तक रहेगी। होलिका दहन पूर्णिमा की रात्रि में किया जाता है, लेकिन इस बार पूर्णिमा शुरू होते ही भद्रा लग जाएगी। धर्मसिंधु ग्रंथ के अनुसार भद्रा के मुखकाल में कोई शुभ कार्य नहीं किया जाता। इसलिए भद्रा का मुखकाल छोड़कर पुच्छकाल में, यानी दो मार्च की अर्धरात्रि के बाद होलिका दहन किया जाएगा।
ज्योतिष विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डा. सुभाष पांडेय के अनुसार भद्रा के पुच्छकाल में, रात करीब एक बजे के बाद होलिका दहन का मुहूर्त मिलेगा। तीन मार्च को सायंकाल ग्रस्तोदित चंद्रग्रहण लगेगा। ग्रहण का आरंभ दोपहर 3:20 बजे से माना जाएगा, जबकि चंद्रोदय के बाद शाम 5:59 से 6:48 बजे तक इसका प्रभाव रहेगा। ग्रहण से नौ घंटे पहले, यानी सुबह 6:20 बजे से सूतक काल शुरू हो जाएगा। सूतक काल में पूजा-पाठ के अलावा अन्य शुभ कार्य और उत्सव वर्जित माने जाते हैं। इसी कारण तीन मार्च को रंगोत्सव नहीं मनाया जाएगा और इसे चार मार्च को आयोजित किया जाएगा।
वहीं, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के ज्योतिषाचार्य प्रो. अमित शुक्ल ने कहा कि होलिका दहन दो मार्च की अर्धरात्रि के पश्चात भोर में 4:56 बजे के बाद किया जा सकता है। तीन मार्च को सूतक में भी रंग खेला जा सकता है, खाना-पीना नहीं करेंगे। कहीं नहीं लिखा है कि ग्रहण के सूतक काल में रंग खेलना मना है। चाहें तो चंद्रग्रहण के मोक्ष के पश्चात भी स्नान-दान करके रंगोत्सव मना सकते हैं, लेकिन रात्रि की बजाय दिन में मनाया जाना उपयुक्त होगा।
24 फरवरी से शुरू हो रहा होलाष्टक
होलिका दहन से पहले के आठ दिन होलाष्टक कहलाते हैं। यह फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से शुरू होते हैं। साल 2026 में होलाष्टक 24 फरवरी से शुरू होकर 3 मार्च तक रहेंगे। ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार इन दिनों में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन या किसी नए काम की शुरुआत जैसे मांगलिक कार्य नहीं किए जाते।

