बिहार विधानसभा के चुनाव परिणामों ने १५ साल बाद पुन जो लालू परिवार के मुकाबले एनडीए को सफलता दी उससे यह स्पष्ट हो रहा है कि महान विचारक चाणक्य की धरती पर मोदी मैजिक और अमित शाह के समीकरणों ने सारे मिथक तोड़ ब्रांड मोदी की चमक और धमक बरकरार रखी। विपक्ष वोट चोर ही करता रह गया और एनडीए मोदी के प्रचार और इसके नेताओं के दावो और घोषणाओं को सही मानकर महिलाओं ने पूरी व्यवस्था ही बदलकर रख दी। यह कहने में हर्ज नहीं है कि मतदाताओं ने बिहार में गर्दा उड़ाते हुए चमत्कार किया। जिसने विपक्ष के समीकरण धराशायी कर दिए। वैसे तो चुनाव में कब क्या हो जाए नहीं कहा जा सकता लेकिन बिहार में एनडीए की बहार ने २०२९ के लिए लोकसभा और २०२७ के यूपी विधानसभा चुनाव में अपनी स्थिति सुधारने के लिए सोचने और काम करने का समय दिया है। विजेताओं के लिए यह चुनौती होगी लेकिन पराजितो को सबक लेने का संदेश भी सामने है। क्योंकि नमो नीतिश की सुनामी से जो एक प्रकार से महागठबंधन का सूपड़ा साफ हुआ है उससे समझ लेना चाहिए कि एनडीए की एकता और सोशल इंजीनियरिंग और महिलाओं का समर्थन आगे भी बड़ा गुल खिला सकता है इससे बचने के लिए विपक्ष को वोट चोर का नारा देने की बजाय काम करने की जरूरत है वरना बिहार का जनादेश आगे भी कुछ नया कर सकता है क्योंकि मोदी शाह की सोच के आगे जो विपक्ष कमजोर पड़ रहा है भविष्य में आगे ऐसा ना हो और एनडीए उम्मीदवारों की लहर आगे ना चल पाए इसे ध्यान रखते हुए समझ लेना चाहिए कि बिहार की जीत के कई मायने हमें सोचने के लिए मजबूर कर रहे हैं।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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