इस वर्ष २०२५ में नगर निगम आम आदमी के विश्वास और सरकार द्वारा दी गई जिम्मेदारियों को पूरा करने में नागरिकों के अनुसार खरा नहीं उतर पाया। क्योंकि इससे संबंध जिम्मेदार लोग सिर्फ दावे और बयान ही देते रहे। पार्षदों की भारी मौजूदगी के बाद भी वो जनसमस्याओं की पूर्ण जानकारी कर पाया ना समस्याओं का समाधान। वो भी उस परिस्थिति में जब केंद्र और प्रदेश में चल रही सरकार की पार्टी का पूर्ण वर्चस्व पार्षदों की संख्या मेयर की मौजूदगी और सरकार से मिल रही सहायताओं के चलते भी या तो जांच बैठाई जाती रही अथवा नाराजगी व्यक्त की जाती रही। जो भी हो सरकार की नीति और सीएम योगी की भावनाओं के हिसाब से नगर निगम जनता को अपेक्षित सुविधाएं नहीं दिलाया पाया। किसी भी विभाग के लिए यह बात सम्मानजनक नहीं हो सकती कि नागरिक उसकी व्यवस्थाओं से संतुष्ट ना हो क्योंकि पार्षद भी निगम के अधिकारियों की कार्यप्रणाली से संतुष्ट नहीं रहे। सफाई के नाम पर सालभर कहीं ना कहीं कूढ़े के ढेर नालों की सिल्ट सड़क किनारे पड़ी दिखती रही। महानगर को जोड़ने वाले मार्गो पर जो गंदगी का ढेर दिखाई दिया वो निगम की कार्यप्रणाली की ओर इशारा करते रहे। एक खबर के अनुसार पूरे साल प्रदूषण के मामले में नगर निगम क्षेत्र ऊपर नीचे होते रहे और दिसंबर के २८ दिन आम आदमी का दम घुटता रहा। छह साल में सबसे ज्यादा जानलेवा मेरठ की हवा रही जिससे राहत दिलाने में कोई सफलता दावों के बाद नगर निगम की नहीं रही। निगम अधिकारी निराश्रितों के लिए रेस्कयू वाहन का शुभारंभ कर रहे हैं जबकि हर पार्षद से ऐसे मामलों की जानकारी और छुटकारा कैसे मिले और पात्रों को सुविधा के लिए सुझाव मिल सकते थे। रेस्कयू वाहन के बारे में एक पूर्व पार्षद का कहना कि वीआईपी क्षेत्रों को छोड़कर हर जगह गंदगी का आलम किसी से छिपा नहीं है लेकिन नगर निगम इसके लिए भी जागरूकता अभियान चला चुका है। आज एक खबर पढ़ी कि यातायात और पर्यावरण की व्यवस्था भी संभालेगा नगर निगम। पर्यावरण नियोजन अनुभाग बनेगा। अधीशासी अभियंता आदि की तैनाती होगी। सरकार का यह फैसला सही है लेकिन नगर निगम की खस्ताहालत के चलते यह आशंका गलत नहीं है कि यहां यह व्यवस्था कामयाब रहेगी क्योंकि खराब पर्यावरण के लिए नगर निगम भी जिम्मेदार है। यातायात व्यवस्था में निगम अधिकारी भी जनता को हो रही परेशानी के आरोप से बच नहीं सकते। क्योंकि सड़कों पर मलबा रेत ईट बेचे जाने और दुकानों के बाहर सामान लगाने पर प्रतिबंध होने के बाद भी सारे शहर में इसका जाल फैला है। दस्ता चालान करता है विवादों को जन्म देता है और उसके जाने के बाद फिर वही व्यवस्था लागू हो जाती है। नागरिकों के इस कथन में सच्चाई नजर आती है। नाले नालियों के सुधार की बात करे तो जो काम शुरू कराए गए उन पर शुरू होते ही आरोप लगने लगे या काम होने के बाद उनमें कमियां पाई गई। निर्माण अनुकूल होने की बात सामने नहीं आई। सरकार यातायात पर्यावरण या अन्य जिम्मेदारी नगर निगम को ना देकर डीएम की देखरेख में अभियान चलवाए तो उसका कुछ लाभ नागरिकों व शहर को हो सकता है जिसकी उम्मीद निगम अधिकारियों से नहीं की जा सकती। मैं यह तो नहीं कहता कि निगम अधिकारी योग्य नहीं है या वो काम नहीं करना चाहते लेकिन जनता जो कह रही है जो नजर आ रहा है उसके अनुसार नाकामी ज्यादा दिखाई देती है और निगम क्षेत्र के गांवों की स्थिति और भी खराब है। मुख्यमंत्री जी नगर निगम को और जिम्मेदारियां ना देकर उनका काम ही सही तरह से करा लिया जाए तो सरकारी योजनाओं को कामयाब कराने वाला रहेगा। बाकी सब हर बात जानते हैं और अधिकारी जनप्रतिनिधि भी इससे अनभिज्ञ नहीं है।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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