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    इसकी पहचान बनाए रखने हेतु दूरसंचार विभाग दे ध्यान! 11 अप्रैल 1931 को पहली बार सुना था खेल का आंखो देखा हाल, 105 साल बाद आज भी कायम है रेडियो की बादशाहत

    adminBy adminApril 11, 2026No Comments1 Views
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    आज जब मनोरंजन व जानकारियों के अनेेको साधन सामने आ चुके हैं। जिनमें २४ घंटे लोगों को हर प्रकार की सामग्री प्राप्त होती है के बाद भी रेडियो आज भी परिवारों में अपनी जगह बनाए हुए है। वो बात और है कि अब सस्ते रेडियो के साथ हजारों रुपये के कार्गो जिनमें आप मनपसंद गाने सुन सकते हैं और आज भी प्रसिद्ध रेडियो उदघोषक अमीन सियानी की आवाज में प्रस्तुतिकरण और कलाकारों व गायको के बारे में खबरें सुन सकते हैं। एक समय था कि जब यह तय था कि इस समय कृषि कार्यक्रम आएंगे। सप्ताह में एक बार फिल्म के बारे में सुनने को मिलेगा और बिनाका गीत माला का सभी इंतजार करते थे और जिनके घर में रेडियों था वहां भीड़ लगती थी बाजारों में खबरें सुनने को हुजुम जुटता था। यह कह सकते हैं कि १०५ साल पहले ११ अप्रैल १९२१ को अमेरिका के पिटसबर्ग शहर में रेडियो पर खेल का आंखों देख हाल सुनाया गया था। वो दौर था जब लोग पहली बार स्टेडियम जाए बिना रेडियो के जरिए मैच को महसूस कर रहे थे। इससे संबंध एक खबर के अनुसार रेडियो पर पहली बार खेल का आंखों देखा हाल 11 अप्रैल 1921 को अमेरिका के पिट्सबर्ग शहर में सुनाया गया था। यह वह दौर था, जब लोग पहली बार स्टेडियम जाए बिना, रेडियो के जरिये मैच के शोर, घंटी की आवाज और मुक्कों के प्रहार को महसूस कर रहे थे। उस वक्त रेडियो पर प्रसारित होने वाला दुनिया का पहला खेल मुक्केबाजी था। पिट्सबर्ग डेली पोस्ट के खेल संपादक फ्लोरेंट गिब्सन ने पहली बार रेडियो पर कमेंट्री की थी। यह मुकाबला उस समय के दिग्गज मुक्केबाज जॉनी रे और जॉनी डंडी के बीच लड़ा गया था। जॉनी डंडी को 1991 में इंटरनेशनल बॉक्सिंग हॉल ऑफ फेम में शामिल किया गया था। 20वीं सदी की शुरुआत में रेडियो का इस्तेमाल बातचीत (दो-तरफा संचार) के लिए होता था। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अमेरिकी सेना के नियंत्रण की वजह से रेडियो का सार्वजनिक उपयोग कम हो गया था। 27 अक्तूबर, 1920 को केडीकेए दुनिया का पहला लाइसेंस प्राप्त रेडियो स्टेशन बना। रेडियो सुनने वालों को रिंग में चल रहे हर मुक्के का अनुभव बिल्कुल असली लगा था।
    वर्तमान में मेरे अपने परिवार में मनोरंजन और जानकारी के लिए हर प्रकार की आधुनिक साधन है लेकिन कार्गो रेडियो की उपस्थिति हमारा खूब मनोरंजन करती है। मैं सुबह शाम रेडियो पर गाने सुनता हूं और मेरी दो साल की पोती कार्गो के गानों पर नाचने लगती और अन्य सदस्य भी रेडियो पर अमीन सयानी की प्रस्तुति और लोकगीत सुनकर मस्ती करते हैं। जिससे यह कह सकते हैं कि एक शताब्दी से रेडियो अपना वर्चस्व कायम करने में सफल है और आधुनिक होता जा रहा है। किसान भी खेतों में रेडियो सुनते हैं जिससे काम की थकान नहीं होती। गाड़ियो में चल रहे रेडियो समय का पता नहीं चलने देते और मनपसंद गाने सुनने को मिलते हैं। आधुनिक समय में भी रेडियो का प्रमुख स्थान है।
    एक बात समझ से बाहर है कि सरकारी रेडियो स्टेशन धीरे धीरे अपनी पहचान खो रहे हैं क्योकि स्कूलों में इनके संचालकों द्वारा पढ़ाने और जानकारी के लिए रेडियो की फ्रेंचाइजी ले रखी है और उन पर विज्ञापन प्रसारित कर कमाई की जा रही है। कुछ लोगों का कहना है कि सरकारी रेडियो स्टेशनों के अफसर इन निजी रेडियो संचालकों की आवभगत के चलते वो प्रयास नहीं करते जो किसी की पहचान बनाए रखने के लिए जरुरी है। मेरा मानना है कि सूचना प्रसारण मंत्रालय को रेडियो स्टेशनों के अधिकारियों की लगाम कसनी चाहिए और जिन्होंने शिक्षा के नाम पर इसे लेकर कमाई का साधन बना लिया है उनसे पूरा टैक्स लिया जाए।
    (प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)

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