देश में खेलों की परंपरा हमेशा रही है। वर्तमान में सरकारें गांव से लेकर शहर तक के युवओं को खेल में बढ़ावा देने के लिए बहुत कुछ कर रही है। शायद इसी का परिणाम है कि अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगितयों में अब हम ज्यादा पुरस्कार जीतकर ला रहे हैँ। लेकिन इस ओर खेल प्रेमियों को ध्यान देना होगा कि कबडडी रस्साकशी फुटबाल हॉकी और खों खो जैसे अन्य भारतीय खेलों को बढ़ावा दे और इनके खिलाड़ियों को प्रोत्साहन और नौकरियां दी जाए। क्योंकि विदेशी बताए जाने वाले खेल क्रिकेट में कोई कमी नहीं है लेकिन इसे लेकर ऐसी दौड़ शुरु हो गई है जिसमें हर कोई क्रिकेट खेलने में लगा है चाहे उसे बेट पकड़ना ना ही आता हो। परिणामस्वरुप जितना देखने को मिलता है यह खेल स्कूलों और गावों से निकलकर नौकरशाहों में लोकप्रिय हो रहा है। इसमें कोई बुराई नहीं है अगर वह कार्यदिवस से अलग इसे खेले। पिछले दिनों एक दफ्तर में जाना हुआ। क्रिकेट प्रतियोगिता तो दूसरे कार्यालय के साथ से काफी दिन बाद होनी तय हुई लेकिन उसके नाम पर आम आदमी की समस्याओं का समाधान करने की बजाय क्रिकेट की तैयारी को लेकर चर्चाएं चलती देखी गई। एक बाबू से फाइल देखने का आग्रह किया गया तो उसने कहा कि हमारी टीम हार गई तो हमारी बेइज्ज्ती होगी। जीत गए तो उसकी खुशी मनाने के नाम पर जो व्यवस्था चल रही है, उससे जनता के कार्य प्रभावित हो रहे है। सरकारी योजनाएं व नीति भी समय से लागू नहीं होने से प्रभावित हो रही हैं। दो सप्ताह पहले एक कार्यालय में देखा कि प्रदेश सरकार द्वारा बनवाए गए प्रचार कैलेंडर जो भेजे गए वह ब्लॉक व गांवों मुख्यालयों को भेजे जाने की बजाय कार्यालय में ही रददी बनी पड़ी थी। अपना काम करने की बजाय अमेरिका जीतेगा या कोई ओर उस पर चर्चा ज्यादा चल रही थी। राष्ट्रीय स्तर की घटनाओं पर नजर रखना बुरी बात नहीं है लेकिन जिस काम के पैसे सरकारी कर्मचारी ले रहे हैं उसे समय पर पूरा करें और खाली समय में चर्चा करें तो किसी को क्या परेशानी हो सकती है।
प्रधानमंत्री जी खेलों को तो बढ़ावा दिया जाना चाहिए लेकिन जनता के काम भी होते रहें इसके लिए सभी मंडलायुक्त व डीएम को निद्रेश दें कि १० से पांच के समय में खेल या किसी भी विषय पर होनी वाली चर्चाएं और काम बंद होनी चाहिए।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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