नई दिल्ली। वर्ष 2028-29 के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) की अस्थायी सदस्यता के लिए भारत की दावेदारी पेश करते हुए विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि मौजूदा अस्थिर दुनिया में भारत समान अवसरों वाली और सुरक्षित व्यवस्था बनाने का प्रयास करेगा।
उन्होंने मंगलवार को आयोजित कार्यक्रम में भारत की उम्मीदवारी की घोषणा करते हुए कहा, “यह दुनिया के सामने गहन विरोधाभास का समय है। कभी भी मानव कल्याण को आगे बढ़ाने की इतनी बड़ी क्षमता नहीं थी, लेकिन साथ ही संघर्ष, हिंसा और अस्थिरता के स्तर भी ऐसे हैं जो दूर बैठे लोगों को भी प्रभावित कर सकते हैं।”
उन्होंने स्पष्ट किया कि इस जटिलता का समाधान संयुक्त राष्ट्र को नेतृत्व करना चाहिए और सुरक्षा परिषद को रास्ता दिखाना चाहिए। इसलिए परिषद की सदस्यता के चुनाव बेहद महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
विदेश मंत्री जयशंकर ने इसके साथ ही वैश्विक उन्नति सुनिश्चित करने के लिए भारत की तरफ से एक नया नारा शांति यानी एसएसएएनटीआइ-सिक्यूरिंग होलिस्टिक एडवांसमेंट थ्रू नॉर्म्स, ट्रस्ट एंड इंटेग्रिटी (नियमों, भरोसे और सत्यनिष्ठा के जरिए समग्र उन्नति) का नारा दिया।
भारत के दृष्टिकोण को रेखांकित करते हुए कहा कि, “शांति को प्रगति और समृद्धि को खंडित तरीके से नहीं बनाए रखा जा सकता। स्वतंत्रता के बाद उभरे कई देशों की तरह भारत मानता है कि शांति वर्चस्व से नहीं बल्कि भागीदारी से मजबूत होती है।”
आज की दुनिया सप्लाई चेन, प्रौद्योगिकी और संचार से इतनी मजबूती से जुड़ी हुई है कि समग्र विकास ही एकमात्र विकल्प है। इसके लिए वैश्विक व्यवस्था का सम्मान, नियमों का पालन, विश्वास और सत्यनिष्ठा जरूरी है।
भारत की प्राथमिकताओं की चर्चा करते हुए जयशंकर ने कहा कि हम सुरक्षित, शांतिपूर्ण और समान विश्व का निर्माण चाहते हैं। इसमें ग्लोबल साउथ की आवाज को बराबरी का दर्जा मिले, शांति स्थापना समकालीन और भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार हो, बहुपक्षवाद वर्तमान वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करे और प्रभावी समाधान दे।
प्रौद्योगिकी के वादे को पूरा किया जाए लेकिन उसके दुरुपयोग से बचाव भी हो। समुद्र सुरक्षित रहें, आतंकवाद का सफाया हो और जलवायु कार्रवाई, जलवायु न्याय, स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण तथा सतत विकास को बढ़ावा मिले।
उन्होंने विकासशील व गरीब देशों की हिस्सेदारी जिक्र करते हुए कहा कि वैश्विक शासन को बदलने के लिए बहुपक्षवाद को लोकतांत्रिक, प्रतिनिधित्वपूर्ण और प्रभावी बनाना होगा। सुरक्षा परिषद को अधिक मजबूत, उत्तरदायी और तैयार रहना चाहिए। भारत जैसे देश, जो मतभेदों को पाटने और आम सहमति बनाने में लंबा अनुभव रखते हैं, इसमें अहम योगदान दे सकते हैं।
जयशंकर ने अंत में कहा कि भारत की सदस्यता वैश्विक व्यवस्था को नियम-आधारित, विश्वसनीय और समावेशी बनाने में मदद करेगी। शांति के सिद्धांत के साथ भारत समग्र मानव कल्याण और शांति के लक्ष्य को मजबूती प्रदान करेगा।

