लिव इन रिलेशन को लेकर आजकल कई खबरें पढ़ने सुनने के मिलती हैं जहां बड़ी तादात में लोग इसे सही नहीं मानते हैं वही कई बार इस तरह से साथ रहने वाले जोड़ों के जो परिणाम सामने आए हैं वो भी सुखद नहीं है। उसके बावजूद इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति जेजे मुनीर व न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की पीठ ने अलीगढ़ में अपनी मर्जी से शादी करने वाले बालिग जोड़े की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि बालिगों की पसंद की शादी को कोई नहीं बना सकता सम्मान का मुददा। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में राज्य जोड़ों के जीवन व संपत्ति की रक्षा करे भले ही उन्हें अपने परिवार से खतरा क्यों ना हो। इसी प्रकार एक दूसरे मामले में व्यक्ति की स्वतंत्रता के जीवन मूल्य को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए अंतर धार्मिक जोड़े की सुरक्षा आवश्यक बताई है। कोर्ट ने लता सिंह बनाम उप्र राज्य के मामलों में सुप्रीम कौर्ट के निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि जाति धर्म के आधार पर भेदभाव करना संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है। लिव इन रिलेशन किसी भी कानून के तहत प्रतिबंधित या दंडनीय अपराध नहीं है। इसे जब तक नहीं रोका जा सकता जब तक जबरल धर्मांतरण जैसा कोई मुददा ना हो। दूसरी तरफ भारत में होने वाले जनगणना में भी लिव इन रिलेशन में रहने वाले जोड़ृों को विवाहित माने जाने की बात सामने आई है। कुल मिलाकर यह लगता है कि बालिक युवक युवती को अपनी मर्जी से शादी करने और लिव इन रिलेशन में रहने का अधिकार अदालत भी देती है। दूसरी तरफ जहां तक परिजनों की बात है उनका भी सोचना सही है कि २० से २५ साल तक संतान का ध्यान रखते हुए उन्हें सुविधा भी दी जाती है। ऐेसे में किसी अनजान व्यक्ति के साथ उसे कैसे रहने और जाने दिया जाए। मगर मुददा यह है कि सरकार भी किसी भी प्रकार की ज्यादती और रोक लगाने का अधिकार नहीं देती। न्यायालय तो स्पष्ट कर रहा है कि यह गलत नहीं है। किसी को भी इसे सम्मान का मुददा नहीं बनाना चाहिए। सवाल उठता है कि आखिर बच्चों की जिद के आगे मां बाप क्या करें। मुझे तो यही लगता है कि जिस प्रकार हम अपने बच्चों को समाज की व्यवस्थाओं का ज्ञान कराते हैँ। उन्हें पढ़ाने अैर स्वस्थ रहने का माहौल देते हैं। रिश्तों के बारे में समझाया जाता है। उसी प्रकार बचपन से ही लड़का लड़की को यह भी समझाना चाहिए कि किन परिस्थितियों में क्या परेशानियां हो सकती है। अगर फिर भी बच्चे ना माने क्योंकि युवा सोच तथा अपनी इच्छापूर्ति के लिए अडिग रहे तो जो होगा ठीक होगा सब भगवान की मर्जी पर छोड़ उनके रिश्ते को अपनाकर परिवार को भी उन्हें कष्ट में देखकर परेशानी ना हो। इस समस्या का यही समाधान हो सकता है या सरकार इसके लिए कोई अलग से नियम बनाए अथवा किसी मामले में अदालत के आदेश को आधार बनाकर बच्चों को समझाने का प्रयास किया जा सकता है।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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