नई दिल्ली 21 मार्च। अग्निपथ योजना में नेपाली गोरखाओं की भर्ती के रास्ते बंद हो गए हैं। सेना ने इसको लेकर अलग से कोई अधिसूचना जारी नहीं की है, लेकिन हाल में जारी भर्ती अधिसूचनाओं में गोरखा की जगह सिर्फ भारतीय गोरखा का कॉलम रखा गया है। यह अधिसूचना जून से शुरू होने वाली भर्ती के लिए है।
सूत्रों ने कहा, इसका मतलब साफ है कि सिर्फ भारतीय गोरखा ही योजना के लिए आवेदन कर सकते हैं। नेपाली गोरखा के लिए अब कोई एंट्री नहीं है। इससे भारत में रह रहे गोरखा नौजवानों के लिए सेना में पहले से बेहतर अवसर पैदा होंगे।
नेपाल का रुख जिम्मेदार
दरअसल चार साल पहले जब अग्निपथ योजना शुरू हुई थी तो नेपाल ने यह कहकर इसका विरोध किया था कि सेना में भर्ती को लेकर यह भारत ब्रिटेन और नेपाल के बीच हुए आजादी से पहले हुए एक त्रिपक्षीय समझौते का उल्लंघन है। इस समझौते के तहत भारत ने एकतरफा सेना में भर्ती में बदलाव किया है जिसे मानने को वह बाध्य नहीं है। इसके बाद नेपाल में सेना के दो भर्ती केंद्र भी बंद हो गए, जहां नियमित रूप से सेना के लिए गोरखाओं की भर्ती होती थी। हालांकि भारत की तरफ से नेपाल को समझाने की कोशिश की गई लेकिन नेपाल नहीं माना।
क्यों लागू किया गया यह नियम
सूत्रों की मानें तो लंबे समय से नेपाल में उत्पन्न भारत विरोधी माहौल इसके पीछे प्रमुख रूप से जिम्मेदार है। दूसरा, नेपाली गोरखाओं के लिए सुरक्षा क्षेत्र में कार्य करने के बहुत सारे अवसर मौजूद हैं। सिंगापुर लंदन से लेकर दुनिया के तमाम शहरों में निजी सुरक्षा एजेंसियों में उनकी खासी मांग है और सेना से भी बेहतर पैकेज मिलता है।
इधर, रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भी गोरखाओं को रूस की सेना में कार्य करने के मौके मिले हैं। ब्रिटेन की सेना में भी गोरखाओं की भर्ती जारी है। यही कारण है कि अग्निपथ योजना से पहले भी गोरखाओं की सेना में भर्ती होने में दिलचस्पी कम होने लगी थी।
सूत्रों के अनुसार, भारतीय सेना की सात गोरखा राइफल्स में अभी भी करीब 30 हजार से अधिक नेपाली गोरखा कार्यरत हैं। हर राइफल्स में पांच बटालियन होते हैं। एक बटालियन में करीब एक हजार से अधिक जवान होते हैं। इतना ही नहीं, नेपाल में लाखों पूर्व गोरखा सैनिक हैं जिन्हें भारत से करीब पांच से छह सौ करोड़ रुपये प्रतिवर्ष पेंशन के रूप में भुगतान किया जाता है।

