नई दिल्ली, 02 मार्च (जा)। आबकारी घोटाला मामले में राऊज एवेन्यू की विशेष अदालत ने सीबीआई के साथ ही ईडी के तरीके पर चिंता जताते हुए कहा कि जल्दबाजी में की गई ईडी जांच और गिरफ्तारी लोगों के अधिकारों को प्रभावित कर रही है। राऊज एवेन्यू के विशेष न्यायाधीश (सीबीआई) जितेंद्र सिंह की अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में तथ्यों की न्यायिक जांच किए बिना ही ईडी प्रिवेंशन आफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (पीएमएलए) के तहत गिरफ्तारी और लंबी हिरासत के लिए शक्तियों का प्रयोग करती है।
इससे ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है, जहां किसी व्यक्ति को एक ऐसे आरोप के आधार पर व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित किया जाता है, जिसकी कानूनी स्थिरता अनिश्चित रहती है और समानांतर जांच भविष्य के परिणाम पर निर्भर करती है।
गत दिवस अदालत ने आबकारी घोटाले से जुड़े सीबीआइ के मामले में पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, बीआरएस नेता के. कविता सहित 23 को आरोपमुक्त कर दिया था। अदालत ने कहा था कि किसी के खिलाफ कोई साक्ष्य नहीं है और प्रथम दृष्टया मामला नहीं बनता है।
ऐसी स्थिति में जब पीएमएलए के तहत कार्रवाई शुरू होती है, तो उस अपराध की जांच पूरी नहीं होती और कई मामलों में तो आरोपपत्र भी दाखिल होने का इंतजार होता है। साथ ही अदालत ने आर्थिक अपराधों की असरदार जांच और किसी व्यक्ति की निजी आजादी के अटूट अधिकार के बीच सावधानी से संतुलन बनाने के लिए एक फ्रेमवर्क बनाने की जरूरत पर जोर दिया।
विशेष न्यायाधीश ने कहा कि यह अदालत खुद एक ऐसे मामले की गवाह है, जहां मनी लांड्रिंग से जुड़ी कार्रवाई आरोप पर बहस के आखिरी स्तर पर पहुंच गई है, जबकि उस अपराध में यह पता लगाने के लिए जांच अभी भी चल रही है कि कोई अपराध हुआ भी है या नहीं। इससे गंभीर कानूनी और संवैधानिक चिंता पैदा होती है।
अदालत ने कहा कि जब किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगा दी जाती है, तो उसे बाद में आरोपमुक्त करके सही मायने में न्याय नहीं किया जा सकता है, न ही समय बीतने से बिना वजह प्री-ट्रायल हिरासत से हुए नुकसान की भरपाई हो सकती है। इसलिए ऐसी ताकत का इस्तेमाल इस तय सिद्धांत के साथ तालमेल बिठाना होगा कि गिरफ्तारी और लंबे समय तक जेल में रखना अपवाद हैं, नियम नहीं।
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