90 प्रतिशत शिकायतें शिमला, सोलन व परवानु व सिरमौर में होने के बावजूद सरकार द्वारा 20 प्रतिशत परियोजनाओं शिकायतों वाले धर्मशाला में रेरा ऑफिस स्थानांतरित किए जाने की अनुमति को लेकर जो विवाद शुरु हुआ वो थमने का नाम नहीं ले रहा है। बीते दिनों ऐसे ही मामले में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत व जस्टिस जॉयमाला बागची की पीठ ने रेरा की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि जिन लोगों के लिए रेरा बनाया गया था वह पूरी तौर पर निराश और हताश हैं क्योंकि यह डिफाल्टर बिल्डरों को सुविधा देने के चलते दागी बिल्डरों की पिछलग्गू हो गई है। आम उपभोक्ता को घर खरीदारों की बजाय बिल्डरों को लाभ पहुंचाने में यह संस्था ज्यादा काम कर रही लगती है। बताते हैं कि एक मई २०१६ में उपभोक्ता के हितों की सुरक्षा व नियम विरुद्ध काम करने वाले बिल्डरों पर अंकुश लगाने के लिए सरकार ने रेरा को बनाया था। लेकिन शिमला ही नहीं जहां तक नजर जाती है इसमें बैठे ज्यादातर सेवानिवृत अफसर हिटलरशाही को अपनाते और कागजी फाइलों के चक्रव्यूह में आम आदमी के हित की व्यवस्था को सिर्फ और सिर्फ रियल इस्टेट के बिल्डरों जो ज्यादातर नियम विरुद्ध काम कर रहे हैं को लाभ पहुंचाने का काम कर रहा है।
जस्टिस द्वारा जारी मामले में टिप्पणी करते हुए कहा गया कि रेरा को बंद करना ही बेहतर होगा। क्योंकि यह डिफाल्टरों को सुविधा देने पर जोर ज्यादा दे रहा है। दागी बिल्डरों को एक प्रकार से कहे तो यह सहारा हो गया है। क्योंकि जो निर्णय रेरा के अधिकारी देते हैं उसे लगभग आम आदमी सही ही मान लेता है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मामले में जारी बिंदु को ध्यान में रखते हुए जो कहा गया अगर उस पर ध्यान दे तो यह किसी भी सरकारी विभाग और उसके अधिकारियों के लिए शर्मनाक है। स्वाभिमानी व्यक्ति को अपने पदों से इस्तीफा दे देना चाहिए
जहां तक देखने में आ रहा है देशवासियों को अपना सिर छुपाने के लिए केंद्र व प्रदेश की सरकारें जितने नियम कानून बना रही हैं उनके बारे में जितना पढ़ने सुनने को मिलता है उससे जहां तक दिखाई दे रहा है यही लगता है कि इससे संबंध विभाग अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने के मामले में गंभीर नहीं है। उदाहरण के तौर पर हम अगर गरीबों व जरुरतमंदों को घर बनाकर देने के लिए बनाए गए प्राधिकरणों व आवास विकास जैसे विभागों के अफसर सरकारी नीतियां लागू करने की बजाय अपने हित साधने में ज्यादा लग गए हैं। अभी पिछले दिनों यूपी रेरा में वरिष्ठ पदाधिकारी के बेटे की हुई तैनाती चर्चाओं में रही जबकि संजय भूसररेडडी ईमानदार अधिकारी के रुप में चर्चित है फिर भी रेरा में उनके पुत्र या रिश्तेदार की नियुक्ति कैसे हुई और उनका यह कहना है कि वह उस समय अवकाश पर थे उचित नहीं लगता है। ऐसे आवास विकास और विकास प्राधिकरणों में प्रकरण आए दिन देखने को मिलते हैं। जानकारों का कहना है कि इन विभागों के अफसर सरकारी नियमों नीतियों को पूरी तौर पर ताक पर रखकर अपनी खुद की नीतियां चला रहे हैं और उपभोक्ता का हित इनके द्वारा बिल्कुल नहीं साधा जा रहा। अवैध निर्माण और बिना सोचे बनाई नीतियों का नुकसान आम आदमी को उठाना पड़ रहा है।
मैंने देखा है कि जब जिलाधिकारी द्वारा नगर निगम, विकास प्राधिकरण और आवास विकास आदि के कार्य देखे जाते थे तो आज के मुकाबले सबकुछ अच्छा चलता था। नियमों का पालन भी होता था और पात्रों को उसका लाभ भी मिलता था। लेकिन अब इनमें अफसरों की भारी संख्या में तैनाती है लेकिन जिनके लिए यह बने वो हताश और निराश ही महसूस हो रहे हैं। अगर दिखवाया जाए तो नगर निगम, विकास प्राधिकरण और आवास विकास आदि के अफसर विकास के लिए आया पैसा भी अन्य काम में लगा देते हैं और निर्धारित सुविधाओं से कई गुना भुगत रहे हैं। जिससे उपभोक्ता अपने आप को ठगा महसूस कर रहा है। हो सकता है मेरी सोच गलत हो लेकिन आम आदमी और पात्रों से निकट का संबंध होने के चलते मुझे लगता है कि यह तीनों विभाग नगर निगम, विकास प्राधिकरण और आवास विकास सभी जगह डीएम के अधिकार क्षेत्र में फिर से दे दिए जाएं क्योंकि उससे काफी सुधार इनके अफसरों की कार्यप्रणाली में हो सकता है जिससे उपभोक्ता लाभान्वित होंगे। जहां तक जानकार कहते हैं कि ज्यादातर अफसर समय से कार्यालय नहीं पहुंचते और मीटिंग के नाम पर कमरा बंद कर बैठ जाते हैं जिससे आम आदमी से भी शासन द्वारा निर्धारित समय में इनसे मुलाकात नहीं हो पाती इसलिए विभाग तो बंद नहीं किए जा सकते लेकिन अगर इसे डीएम के अंडर कर दिया जाता हेै तो प्रशासनिक दृष्टि से इनमें सुधार की संभावना से नकारा नहीं जा सकता। क्योंकि डीएम का रुतबा और प्रशाासनिक व्यवस्था सुधार में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। क्योंकि इन विभागों के अधिकारी भी रेरा के अफसरों की भांति बिल्डरों के पिछलग्गू की भूमिका निभा रहे हो तो कोई बड़ी बात नहीं है।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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- सही है सुप्रीम कोर्ट का निर्णय, डिफाल्टरों को फायदा और बिल्डरों का पिछलग्गू बनी रेरा को बंद करना ही सही है, उपभोक्ता हित में और पात्रों को रहने के लिए आवास उपलब्ध कराने की सरकारी मंशा साकार हो, आवास विकास, प्राधिकरण और नगर निगम पहले की तरह डीएम के
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