नई दिल्ली 03 फरवरी। सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2024 के चर्चित पुणे पोर्श कार हादसा मामले में सबूत से छेड़छाड़ के आरोपी तीनों लोगों को जमानत दे दी है. जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने करीब 18 महीने से जेल में बंद आदित्य सूद, आशीष मित्तल और संतोष गायकवाड़ को बड़ी राहत दी.
शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि अगर जमानत की किसी भी शर्त का उल्लंघन किया गया तो आरोपियों की जमानत रद्द की जा सकती है. तीनों पर नाबालिग आरोपी के ब्लड सैंपल से छेड़छाड़ करने का आरोप है. मामले में यह भी आरोप सामने आए थे कि ब्लड सैंपल बदलवाने के लिए एक मध्यस्थ को तीन लाख रुपये दिए गए थे.
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने दलील दी कि कार में सवार अन्य दो लोगों के खिलाफ कोई आपराधिक आरोप नहीं है और मुख्य आरोपी नाबालिग है. उन्होंने कहा कि यह साबित करने की कोशिश की गई कि घटना के वक्त कार में मौजूद कोई भी व्यक्ति नशे में नहीं था. वकील ने यह भी कहा कि नाबालिग के पिता ने ही आरोपियों से रक्त के नमूने बदलने में मदद करने को कहा था.
शंकरनारायणन ने अदालत में कहा कि यह मामला केवल हादसे तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके बाद जो कुछ हुआ, वह पूरी आपराधिक न्याय प्रणाली को कमजोर करने का उदाहरण है. उन्होंने आरोप लगाया कि घटना के बाद सभी संबंधित लोगों के बीच फोन पर बातचीत हुई और तुरंत एक स्थानीय विधायक मौके पर पहुंच गए. उनके मुताबिक, इसमें पुलिस स्टेशन, किशोर न्याय बोर्ड (जेजेबी) समेत कई संस्थाएं शामिल रहीं और यह एक साजिश का हिस्सा था.
टिप्पणी करते हुए जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने कहा कि संबंधित लोगों के खिलाफ मुकदमा चलेगा, इससे पहले कि जेजेबी मामले पर अंतिम रूप से विचार करे. उन्होंने यह भी कहा कि अदालत नाबालिगों द्वारा शराब सेवन के पक्ष में नहीं है और ऐसे मामलों में माता-पिता की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए. जस्टिस नागरत्ना ने कहा, ‘माता-पिता अपने बच्चों को नियंत्रित करने में असफल रहे, बच्चों ने कार की चाबियां ले लीं और गाड़ी चला ली.’
गौरतलब है कि पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में महाराष्ट्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था. अब जमानत मिलने के बाद भी मामले की सुनवाई और जांच जारी रहेगी.
पुणे शहर में 18-19 मई 2024 की दरम्यानी रात को करीब तीन करोड़ रुपये की पोर्श कार को तेज गति से दौड़ाने के चक्कर में 17 साल के लड़के ने एक बाइक को टक्कर मार दी थी। गाड़ी की टक्कर इतनी जोरदार थी कि बाइक अपना संतुलन खोकर काफी दूर तक सड़क पर घिसटते चली गई, जिससे उस पर सवार दो लोगों की मौके पर ही मौत हो गई थी। इस घटना के 14 घंटे बाद आरोपी नाबालिग को कोर्ट से कुछ शर्तों के साथ जमानत मिल गई थी। कोर्ट ने उसे 15 दिनों तक ट्रैफिक पुलिस के साथ काम करने और सड़क दुर्घटनाओं के प्रभाव-समाधान पर 300 शब्दों का निबंध लिखने का निर्देश दिया था। जब विवाद बढ़ा तो कोर्ट ने उसकी जमानत रद्द कर दी। इसके बाद पुणे पुलिस के आग्रह पर जेजेबी ने आदेश बदला और नाबालिग को ऑब्जर्वेशन होम भेजा। हालांकि, जून 2024 में हाई कोर्ट ने नाबालिग की रिहाई का आदेश दे दिया।
इससे पहले दिसंबर 2024 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने अमर गायकवाड़ समेत आठ आरोपियों की जमानत याचिका खारिज कर दी थी। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार से जवाब मांगा था और अब तीनों को जमानत दे दी गई है। इस मामले में ब्लड सैंपल बदलने के मामले में कुल 10 लोगों को जेल भेजा गया था, जिनमें नाबालिग के माता-पिता विशाल अग्रवाल और शिवानी अग्रवाल, डॉक्टर अजय तावरे और श्रीहरी हालनोर, ससून अस्पताल का कर्मचारी अतुल घाटकांबले, और दो बिचौलिए शामिल हैं।

