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    Home»देश»अदालतों में मुकदमों की संख्या कम करने हेतु छोटे मामलों का तुरंत हो निस्तारण, क्यों चला 7.65 रूपये का मुकदमा 50 साल
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    अदालतों में मुकदमों की संख्या कम करने हेतु छोटे मामलों का तुरंत हो निस्तारण, क्यों चला 7.65 रूपये का मुकदमा 50 साल

    adminBy adminJanuary 19, 2026No Comments1 Views
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    अदालतों में मुकदमों की बढ़ती संख्या और निस्तारण में होती देरी व मिलने वाले न्याय को लेकर हमेशा ही चर्चाएं होती रही हैं। इनमें कमी लाने के प्रयास भी कम नहीं होते। लेकिन मुझे लगता है कि १९७७ में चोरी के एक मामले में दो अज्ञात व्यक्तियों पर ७.६५ रूपये चुराने के आरोप और लिखाई रिपोर्ट का निस्तारण ५० साल बाद होना इस बात का भी प्रतीक है कि मुकदमों की फाइलों को संभालने वालों द्वारा ऐसे मामलों के निस्तारण के लिए कोई विशेष प्रयास जजों के सामने लाकर नहीं किए जाते वरना गैर जमानती वारंट जारी होने के बाद भी ना तो आरोपी और आरोपितों में से किसी का भी उपलब्ध ना होना यह दर्शाता है कि इस मामले का निस्तारण काफी पहले हो जाना चाहिए था। बीती १४ जनवरी को न्यायिक अधिकारी मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी आरती कुलकर्णी द्वारा इस मामले को बंद करते हुए जो टिप्पणी की गई वो अलग है। उन्होंने कहा कि अगर शिकायतकर्ता उपलब्ध नहीं है तो उक्त राशि सरकारी खजाने में जमा कर दी जाए। मेरा मानना है कि यह मामला इस बात का जीता जागता उदाहरण है कि मुकदमों की बड़ी तादात में ऐसे मामलों का बड़ा योगदान हो सकता है। इस प्रकार के जो मुकदमे दर्ज होते हैं उन्हें पहली तारीख में ही निस्तारण ना किए जाने से अदालतों में मुकदमों का बोझ बढ़ रहा है। इस मामले से संबंध दोनों पक्ष ही उपलब्ध हो लेकिन भविष्य में ऐसे प्रकरण की तुरंत सुनवाई और फैसले के लिए विशेष अदालतों का गठन हो और माह में एक बार ऐसे सभी केस सुने जाएं और दोषी को सजा और आरोप सही नहीं है तो उन्हें रिजेक्ट किया जाना जरूरी है क्योंकि इससे आम आदमी को जल्दी न्याय मिलने की संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता।
    (प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)

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