फतेहाबाद 08 जनवरी। हरियाणा के एक परिवार ने इस दीये को पूरे 19 साल तक जलाए रखा. हरियाणा के फतेहाबाद जिले के ढाणी भोजराज गांव के रहने वाले संजय और सुनीता के घर 19 साल बाद बेटे की किलकारी गूंजी है. लेकिन यह महज एक जन्म की खबर नहीं है, बल्कि एक ऐसे पिता के संघर्ष, सामाजिक दबाव और पितृसत्तात्मक सोच की कहानी है, जिसने 10 बेटियों के बाद भी हार नहीं मानी. संजय ने बताया कि उसकी बच्चियां भी चाहती थीं कि उन्हें एक प्यारा सा भाई मिले.
जींद जिले के उचाना कस्बे स्थित ओजस हॉस्पिटल में जब 37 वर्षीय सुनीता को भर्ती कराया गया, तो डॉक्टरों के लिए यह एक बड़ी चुनौती थी. 10 बच्चों को जन्म दे चुकी सुनीता की यह 11वीं डिलीवरी थी. स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. संतोष और डॉ. नरवीर श्योराण ने बताया कि यह एक ‘हाई रिस्क’ केस था. शरीर में खून की भारी कमी थी, जिसके चलते महिला को तीन यूनिट खून चढ़ाना पड़ा. हालांकि, डॉक्टरों की मेहनत रंग लाई और नॉर्मल डिलीवरी के जरिए बेटे का जन्म हुआ. ताज्जुब की बात यह है कि इतनी जटिल स्थिति के बावजूद सुनीता अगले ही दिन अपने गांव लौट गई.
संजय की जिंदगी किसी फिल्मी संघर्ष से कम नहीं है. वह कभी लोक निर्माण विभाग (PWD) में दिहाड़ी मजदूर थे, लेकिन 2018 में नौकरी छूट गई. इसके बाद उन्होंने मनरेगा में पसीना बहाया, पर पिछले एक साल से वहां भी काम बंद है. आज संजय पूरी तरह बेरोजगार हैं, लेकिन उनके कंधों पर 9 बेटियों (एक बेटी गोद दी जा चुकी है), एक नवजात बेटे, पत्नी और बुजुर्ग मां की जिम्मेदारी है. संजय कहते हैं- काम हो न हो, बच्चों का पेट तो भरना ही पड़ता है. लोग ताने देते थे कि इतनी बेटियां कैसे पालोगे, लेकिन मैंने कभी उन्हें बोझ नहीं समझाय जो हुआ वह भगवान की मर्जी थी. मेरी बेटियां भी चाहती थीं कि उन्हें एक भाई मिले. उनकी भी ये इच्छा अब पूरी हो गई है.
संजय ने बताया कि उनकी सबसे बड़ी बेटी 18 साल की है और 12वीं कक्षा में पढ़ रही है. बाकी बेटियां भी स्कूल जाती हैं. आर्थिक तंगी और बेरोजगारी के बावजूद संजय ने बेटियों की पढ़ाई से कभी समझौता नहीं किया. बेहतर भविष्य के लिए उन्होंने अपनी एक बेटी को रिश्तेदारी में गोद भी दे दिया है.
संजय की मां माया देवी पोते के जन्म से निहाल हैं. वह कहती हैं- भगवान ने बरसों बाद मन्नत पूरी की. लेकिन यह खुशी एक गंभीर सवाल भी खड़ा करती है। हरियाणा, जो लंबे समय से खराब लिंगानुपात से जूझ रहा है, वहां ‘बेटे की चाह’ में 11 बच्चों को जन्म देना समाज की आज भी वही पुरानी मानसिकता को दर्शाता है.
सोशल मीडिया पर मिले जुले रिएक्शन आ रहे हैं. कुछ लोग संजय के जज्बे और बेटियों को पढ़ाने की कोशिश की तारीफ कर रहे हैं, तो कुछ इसे ‘जनसंख्या विस्फोट’ और ‘पुत्र मोह’ की पराकाष्ठा बता रहे हैं.

