दोषी अफसरों के खिलाफ कार्रवाई ना होना दिल्ली जैसे आंदोलनों को न्यौता देने के समान है। हंगामे के बाद एनटीए के ४७ अधिकारी बर्खास्त किए गए । पेपर लीक के दोषियों को १० साल जेल और १० करोड़ जुर्माने की बात चल रही है। सीजेपी शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से कम पर मानती नजर नहीं आ रही है। यह मामला अभी सिमटता नजर नहीं आ रहा । मुझे लगता है कि जिस प्रकार से देशभर में दोषियों को बचाने के लिए प्रपंच हो रहे हैं उसके चलते इस समस्या में बढोत्तरी ही होगी। बताते चलें कि मेरठ के शास्त्रीनगर सेंट्रल मार्केट की दुकानों को लेकर चल रहे प्रकरणों में १९९० से जांच के नाम पर खानापूर्ति करते और दोषियों को बचाते रहे ४५ अफसरों को नामजद किया गया। दुकानदारों के खिलाफ तो धड़ल्ले से कार्रवाई चल रही है मगर अफसरों को बख्शा जा रहा था। जब इनके खिलाफ आवाज उठनी शुरु हुईतो अजब सिंह नामक जेई की तरफ से २१ व्यापारियों को नामजद कर एफआईआर कराई गई। अब जानकारों के अनुसार व्यापारियों को छोड़ने की आड़ में दोषी नामजद अफसरों को पुलिस ने जमानत दे दी। आखिर यह गोरखधंधा नागरिकों के अनुसार कब तक चलेगा और कुछ अफसरों की स्वार्थ पूर्ति का खामियाजा आम आदमी कब तक भुगतता रहेगा। ऐसे मामलों में कुछ लोग कहते हैं है कि हम भी लालच करते हैं तो यही कहा जा सकता है कि पूरी तौर पर रोजगार उपलब्ध ना होना और आर्थिक समस्याओं के चलते मजबूर तो सोचता है कि रोटी रोजी का जुगाड़ किया जाए लेकिन अफसरो को भरपूर वेतन और सुविधाएं मिलती है तो फिर वो निर्धारित नीति नियमों का उल्लंघन क्यों होने देते हैं। बताते हैं कि ४९ में से चार अफसरों की तो मौत हो चुकी है। बाकी को जमानत मिल गई। अब इस बात से इनकार नहीं कर सकते हैँ कि यह अपने आपको निर्दोष साबित करने के लिए साम दाम की हर नीति अपनाकर बचने की कोशिश करेंगे क्येांकि रिटायर होने वालों को पेंशन और सेवा में रहने वालों को वेतन मिल रहा है। लेकिन व्यापारी तो अपना काम बचाने में ही उलझा हुआ है। जिम्मेदार उसे हर तरह से फंसाने और झूठा आश्वासन देने में ही लगे हैं। मेरा मानना है कि व्यापारी नेताओं व जनप्रतिनिधियों को दोषी अफसरों को मिली जमानत का विरोध करना चाहिए। नियमानुसार कोशिश हो कि इन्हें जल्द जेल भेजा जाए। क्योंकि जब व्यापारी परेशान है तो यह खुशहाल कैसे हैं।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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