प्रयागराज 24 जुलाई। भारतीय रेलवे ने अपने लाखों गैर-राजपत्रित (नॉन-गेजटेड) कर्मचारियों को एक बड़ा तोहफा दिया है। काफी समय से अपने गृह जिले, पसंदीदा मंडल या परिवार के करीब ट्रांसफर का इंतजार कर रहे अनुभवी रेलकर्मियों की राह अब आसान हो गई है।
रेलवे बोर्ड के उप निदेशक (स्थापना) संजय कुमार द्वारा 22 जुलाई 2026 को जारी नए नीतिगत आदेश के तहत 20 वर्ष से अधिक की नियमित सेवा पूरी कर चुके कर्मचारियों के ‘स्वयं के अनुरोध पर स्थानांतरण’ (ओन रिक्वेस्ट ट्रांसफर) को अब सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी। सबसे बड़ी बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया को मानवीय दखल से मुक्त करते हुए मानव संसाधन प्रबंधन प्रणाली (एचआरएमएस) पोर्टल के जरिए स्वचालित (ऑटो ट्रांसफर) कर दिया गया है। रेलवे बोर्ड के इस दूरगामी फैसले से देश के सभी जोनों में तैनात लाखों रेलकर्मियों और उनके परिवारों में खुशी की लहर दौड़ गई है।
भारतीय रेलवे में अब तक स्व-अनुरोध पर ट्रांसफर की प्रक्रिया काफी जटिल, लंबी और थकाऊ मानी जाती थी। पुरानी व्यवस्था के तहत कर्मचारी जिस तारीख को ट्रांसफर का आवेदन जमा करता था, उसी के आधार पर उसकी वरिष्ठता दर्ज की जाती थी। इसके बाद आवेदन को संबंधित डिवीजन से रिलीविंग यूनिट और फिर एक्सेप्टिंग यूनिट तक भेजा जाता था।
प्रक्रिया का सबसे बड़ा रोड़ा ‘अनापत्ति प्रमाण पत्र’ यानी NOC प्राप्त करना होता था। कई बार प्रशासनिक देरी, पदों की अनिश्चितता और एनओसी न मिलने के कारण कर्मचारी 10 से 15 वर्ष तक अपनी अर्जी के निस्तारण का इंतजार ही करते रह जाते थे। इस वजह से न केवल कर्मचारियों का मनोबल प्रभावित होता था, बल्कि वे अपने पारिवारिक दायित्वों और बच्चों की शिक्षा से भी दूर रहने को मजबूर थे। रेलवे बोर्ड ने इस व्यावहारिक समस्या की गहराई को समझा और सेवा के दो दशक पूरे कर चुके कर्मियों को प्राथमिकता देने का निर्णय लिया।
माह की पहली तारीख को अपडेट होगी सूची
नई नीति की सबसे बड़ी खासियत इसका डिजिटल और पारदर्शी स्वरूप है। आदेश के अनुसार, ट्रांसफर चाहने वाले रेलकर्मियों को एचआरएमएस पोर्टल पर ही अपना ऑनलाइन आवेदन जमा करना होगा। इसके बाद हर माह की पहली तारीख को एचआरएमएस पोर्टल खुद एकीकृत प्राथमिकता सूची (कंसोलिडेटेड प्रायोरिटी लिस्ट) तैयार करेगा। यह सूची केवल उन कर्मचारियों की होगी जिनकी नियमित सेवा 20 वर्ष या उससे अधिक हो चुकी है। प्राथमिकता का निर्धारण सेवा के वर्षों के घटते क्रम (डिसेंडिंग ऑर्डर) में होगा, यानी जिसने जितनी अधिक सेवा दी होगी, सूची में उसका नाम उतना ही ऊपर होगा।
अब अलग एनओसी की आवश्यकता नहीं होगी
जैसे ही किसी स्वीकार्य इकाई (एक्सेप्टिंग यूनिट) में पद रिक्त होगा, पोर्टल पर उपलब्ध प्राथमिकता सूची के आधार पर स्वतः (ऑटोमेटिक) ट्रांसफर ऑर्डर जारी हो जाएगा। इस पूरी प्रक्रिया की सबसे क्रांतिकारी बात यह है कि अब कर्मचारी को स्थानांतरण आदेश के लिए किसी अलग ‘अनापत्ति प्रमाण पत्र’ (एनओसी) का इंतजार नहीं करना पड़ेगा। एचआरएमएस पोर्टल से ट्रांसफर ऑर्डर जनरेट होते ही उसे ही अंतिम और मान्य आदेश समझा जाएगा।
कर्मचारियों को रिलीव करने में नहीं होगी आनाकानी
स्थानांतरण के आदेश जारी होने के बाद अक्सर कर्मचारियों को रिलीव (कार्यमुक्त) कराने के लिए दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते थे, लेकिन नई नीति में रेलवे बोर्ड ने इसके लिए भी कड़े नियम तय कर दिए हैं। आदेश में स्पष्ट किया गया है कि एचआरएमएस से ऑटो-ट्रांसफर ऑर्डर जारी होने के 15 दिनों के भीतर सक्षम प्राधिकारी (शाखा अधिकारी या वरिष्ठ स्केल अधिकारी) की मंजूरी से कर्मचारी को शारीरिक रूप से कार्यमुक्त करना अनिवार्य होगा।
विशेष परिस्थिति में ही रोक सकेंगे कर्मी की कार्यमुक्ति
केवल कुछ विशेष परिस्थितियों में ही कर्मचारी की कार्यमुक्ति को रोका जा सकेगा। उदाहरण के लिए, यदि कर्मचारी के खिलाफ कोई विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई या सतर्कता (विजिलेंस) का मामला लंबित हो, अथवा उसके पास मौजूद स्टॉक शीट्स और सरकारी संपत्ति का विधिवत प्रभार (हैंडओवर) पूरा न हुआ हो। ऐसे मामलों में भी यदि कोई स्थानापन्न (रिलीवर) तैनात नहीं हुआ है, तो नियंत्रित अधिकारी की जिम्मेदारी होगी कि वह प्रभार सौंपने की प्रक्रिया पूरी कराए।
डीआरएम एक माह के लिए कर्मचारी को रोक सकेंगे
सबसे खास बात यह है कि किसी भी स्थिति में कार्यमुक्ति को रोकने का अधिकार केवल मंडल रेल प्रबंधक (डीआरएम) के पास होगा। डीआरएम की मंजूरी के बाद भी कार्यमुक्ति को अधिकतम एक महीने से अधिक किसी कीमत पर नहीं टाला जा सकेगा। एक माह की अवधि समाप्त होते ही ट्रांसफर आदेश स्वतः निष्पादित माना जाएगा।
पूर्व की व्यवस्था भी लागू रहेगी
रेलवे बोर्ड ने इस नीति का दायरा भी पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है। यह नई व्यवस्था केवल उन कर्मचारियों पर लागू होगी जो एक ही पद और कैडर में रहते हुए स्थान परिवर्तन (चेंज ऑफ प्लेस) चाहते हैं। इस योजना के तहत विभाग या कैडर बदलने की अनुमति नहीं होगी। इसके अलावा ओपन लाइन से प्रोडक्शन यूनिट्स या वर्कशॉप में ट्रांसफर के आवेदनों पर भी इस 20 साल वाली विशेष योजना के तहत विचार नहीं किया जाएगा। वहीं, जिन रेलकर्मियों की नियमित सेवा 20 वर्ष से कम है, उनके ट्रांसफर की प्रक्रिया पूर्व से प्रचलित नियमों और एनओसी व्यवस्था के तहत ही संचालित होती रहेगी।
दो माह में क्रियान्वित होगी सुविधा
इस पूरी तकनीकी व्यवस्था को धरातल पर उतारने के लिए रेलवे बोर्ड ने दो महीने का समय निर्धारित किया है। बोर्ड ने एचआरएमएस टीम और सभी क्षेत्रीय रेलों (ज़ोनल रेलवे) व उत्पादन इकाइयों (पब्लिक यूनिट्स) को निर्देश दिए हैं कि वे अपने डिजिटल डेटाबेस, कैडर वाइज वैकेंसी और कर्मचारियों की सर्विस हिस्ट्री को पूरी तरह अपडेट कर लें। परिपत्र जारी होने की तिथि से ठीक दो महीने बाद यह ऑटो-ट्रांसफर मॉड्यूल पूरी तरह से क्रियाशील (ऑपरेशनल) हो जाएगा। इस ऐतिहासिक फैसले से रेलवे प्रशासन न केवल अपने परिचालन में पारदर्शिता लाएगा, बल्कि दो दशक तक भारतीय रेल की निरंतर सेवा करने वाले कर्मियों को उनके गृह क्षेत्र के करीब भेजकर एक बड़ी मानवीय राहत भी प्रदान करेगा।

