नई दिल्ली 16 जुलाई। सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 22 के तहत मिलने वाला प्राथमिकता का अधिकार यानी पहले खरीदने का हक खेती की जमीन पर भी लागू होगा। धारा 22 क्लास वन उत्तराधिकारियों को किसी अन्य सह उत्तराधिकारी द्वारा ट्रांसफर की जाने वाली संपत्ति खरीदने की प्राथमिकता वाला अधिकार देती है। यह धारा कृषि भूमि पर भी समान रूप से लागू है। इसका मतलब है कि होती अगर परिवार में किसी सदस्य को विरासत में जमीन मिली हैं और वह अपना हिस्सा बेचना चाहता है, तो उसे पहले परिवार के अन्य क्लास वन उत्तराधिकारियों को मौका देना होगा।
हिंदुओं की पैतृक संपत्ति के अधिकार पर असर डालने वाला यह दूरगामी प्रभाव वाला फैसला जस्टिस संजय करोल और एन. कोटिश्वर सिंह ने महिंदर तथा अन्य बनाम पूरन सिंह मामले में सुनाया है। कोर्ट ने महिंदर अपील खारिज करते हुए पहली अपीलीय अदालत और हाई कोर्ट के फैसले को सही ठहराया है, जिसने माना था कि धारा 22 कृषि भूमि पर भी लागू होगी।
इस मामले में याचिकाकर्ता और प्रतिवादी भाई भाई थे। उन्हें पिता की कृषि भूमि विरासत में मिली थी। इनमें से कुछ उत्तराधिकारियों ने अपने हिस्से की भूमि तीसरे पक्ष यानी पूनम को बेच दी। परिवार के एक अन्य सदस्य हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 22 का आधार लेते हुए सिविल कोर्ट में इस विक्री को चुनौती दे दी। उसका कहना था कि बाहर वाले को बेचने से पहले परिवार को मौका मिलना चाहिए।
सिविल कोर्ट ने यह कहते हुए वाद खारिज कर दिया कि कृषि भूमि पर ऐसा अधिकार लागू नहीं होता। वह अपीलीय अदालत गया और पहली अपीलीय अदालत ने सिविल कोर्ट का फैसला पलट दिया। जमीन बेचने वाला पक्ष फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट गया. लेकिन हाई कोर्ट ने अपीलीय अदालत का फैसला सही ठहराया और याचिका खारिज कर दी। इसके बाद महिंदर व अन्य ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 22 कोई सामान्य प्रि-एम्शन कानून नहीं है, बल्कि यह विरासत से जुड़ा अधिकार है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पंजाब प्रि-एम्शन एक्ट और हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 22 दोनों अलग हैं। पंजाब के कानून में तो दूर के रिश्तेदार, किराएदार और सहमालिक तक को पहले खरीदने का अधिकार मिल जाता था। लेकिन हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 22 में ऐसा नहीं है। इसमें अधिकार सिर्फ और सिर्फ क्लास वन उत्तराधिकारियों तक ही सीमित जैसे-बेटे, वेटी, पत्नी, मां… यानी वही लोग, जिन्हें एक ही व्यक्ति से विरासत में संपत्ति मिली है। इसलिए उस फैसले को लागू करके धारा 22 को खारिज नहीं किया जा सकता।
जस्टिस कोटिश्वर सिंह ने अलग से सहमति वाले फैसले में कहा कि धारा 22 के तहत मिला पहले खरीदने का यानी प्रि-एम्शन का अधिकार असल में उत्तराधिकार से जुड़ा मामला है और कुछ नहीं। यह अधिकार अलग-थलग नहीं होता, बल्कि हिंदुओं के बीच गहराई से जुड़ा होता है।

