नई दिल्ली 03 जून। सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि केवल शादीशुदा होने के आधार पर किसी बेटी को अनुकंपा नियुक्ति या कल्याणकारी लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने साफ कहा कि अगर विवाहित बेटी अन्य सभी शर्तें पूरी करती है तो उसका दावा सिर्फ वैवाहिक स्थिति के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने इस दौरान इलाहाबाद हाईकोर्ट के उन फैसलों को भी पलट दिया, जिनमें कहा गया था कि शादीशुदा बेटी परिवार की परिभाषा में नहीं आती और इसलिए उसे अनुकंपा लाभ नहीं मिल सकता। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि विवाहित बेटी को बाहर रखना संविधान के समानता सिद्धांत के खिलाफ है।
क्या था पूरा मामला, महिला क्यों पहुंची अदालत?
उत्तर प्रदेश की एक महिला, जो शादीशुदा थी, अपनी मां के निधन के बाद उचित दर (राशन) की दुकान का लाइसेंस अपने नाम पर चाहती थी। महिला का कहना था कि शादी के बावजूद वह अपने मायके में रहती थी, अपनी दिव्यांग बहन की देखभाल करती थी और अपनी मां के साथ राशन दुकान का संचालन भी करती थी।
लेकिन 2019 के एक सरकारी आदेश के तहत ‘परिवार’ की परिभाषा में विवाहित बेटियों को शामिल नहीं किया गया था। इसी आधार पर उसका आवेदन खारिज कर दिया गया। मामला अंततः सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी महिला के विवाह को उसके अधिकारों के खिलाफ इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि यदि विवाहित बेटों को परिवार का सदस्य माना जाता है तो विवाहित बेटियों को बाहर रखना भेदभावपूर्ण है।
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि महिला का आवेदन सिर्फ इसलिए खारिज किया गया क्योंकि वह शादीशुदा थी और यह “संवैधानिक रूप से अमान्य आधार” है।
साथ ही कोर्ट ने अधिकारियों को चार सप्ताह के भीतर लाइसेंस जारी करने का निर्देश दिया।
इस फैसले की इतनी कानूनी अहमियत क्यों है?
यह फैसला केवल एक राशन दुकान के लाइसेंस का मामला नहीं है। इसका असर देशभर में अनुकंपा नियुक्ति और मृतक आश्रित लाभों से जुड़े मामलों पर पड़ सकता है।
दरअसल भारतीय कानूनों में पिछले दो दशकों में बेटियों को संपत्ति और उत्तराधिकार के मामले में बराबरी के अधिकार मिल चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 2020 में भी स्पष्ट किया था कि बेटियां जन्म से ही पैतृक संपत्ति में बेटों के समान अधिकार रखती हैं।
लेकिन व्यवहार में कई सरकारी योजनाओं और सेवा नियमों में अब भी यह धारणा बनी हुई थी कि विवाह के बाद बेटी अपने मायके के परिवार से अलग हो जाती है। यही सोच इस मामले के केंद्र में थी। संपत्ति में हक था, लेकिन अनुकंपा नियुक्ति में नहीं।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह एक विरोधाभासी स्थिति थी। एक ओर बेटी को पैतृक संपत्ति में बराबरी का अधिकार दिया गया था, लेकिन दूसरी ओर कई मामलों में यह माना जाता रहा कि विवाह के बाद वह परिवार का हिस्सा नहीं रही और इसलिए उसे मृतक आश्रित नौकरी, लाइसेंस या अन्य कल्याणकारी लाभ नहीं मिल सकते।सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले ने इसी विरोधाभास को चुनौती दी है। अदालत ने संकेत दिया है कि विवाह किसी महिला की पारिवारिक पहचान समाप्त नहीं करता।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब क्या बदलाव आएगा?
विवाहित बेटियों के दावे मजबूत होंगे- सरकारी नौकरी में अनुकंपा नियुक्ति, राशन दुकान लाइसेंस और अन्य कल्याणकारी योजनाओं में विवाहित बेटियां अब इस फैसले का सहारा ले सकेंगी।
‘परिवार’ की परिभाषा पर असर- कई राज्यों और विभागों के नियमों में परिवार की परिभाषा अब न्यायिक जांच के दायरे में आ सकती है, यदि उसमें विवाहित बेटियों को बाहर रखा गया है।
लैंगिक समानता को मजबूती- फैसला इस सिद्धांत को मजबूत करता है कि विवाह महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों को कम नहीं कर सकता।
पुराने मामलों की भी समीक्षा संभव- जिन महिलाओं के आवेदन केवल शादीशुदा होने के कारण खारिज किए गए थे, वे भी इस फैसले का हवाला देकर राहत मांग सकती हैं।
इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में क्या अंतर रहा?
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने आदेश में माना था कि 2019 के सरकारी आदेश के मुताबिक “अविवाहित बेटी” शब्द का इस्तेमाल वैध है और इसे भेदभाव नहीं माना जा सकता। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसी व्याख्या संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 15 (लिंग के आधार पर भेदभाव पर रोक) की भावना के अनुरूप नहीं है।

