एक समय था जब दिव्यांग होना अभिशाप से कम नहीं था क्योंकि कम जागरुकता साधनों का अभाव हमेशा ही दिव्यांगों को कचोटने का काम करता था या हमें ही यह दिव्यांगता का श्राप क्यों लगा। शरीर की कोई कमी समाप्त नहीं हो सकती लेकिन अब जिस प्रकार से दिव्यांग तमाम तरह के खेलों में राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उपलब्धि हासिल कर रहे हैं नाम और शोहरत के साथ ही आर्थिक साधन और नौकरियां प्राप्त हो रही है और सरकारें दिव्यांगों को स्वालंबी बनाने और आगे बढ़ने के लिए खूब सहयोग कर रही है। देखा जाए तो अब शरीर की कमी असानी से दूर होना संभव नहीं है लेकिन अगर हौंसला है तो अपने को दीनहीन ना समझकर अपनी काबिलियत का परचम पूरी दुनिया में फहरा सकते हैं। वर्तमान समय में दिव्यांग दुनिया का हर वो काम रहे हैं जो स्वस्थ व्यक्ति ही कर सकता है। सरकार ने शिक्षा दिलाने के साथ ही खेलों में प्रोत्साहन दिलाया है। कांग्रेस सरकार में दिव्यांग जयपाल रेडडी सूचना मंत्री के पद पर काम कर चुके हैं। वैज्ञानिक ऑस्टिन को सुनने के लिए बुद्धिजीवी जाते हैं और उनके आविष्कारों का लोहा सभी मान रहे हैं। इतना ही नहीं यूपी के मेरठ में रियल एस्टेट के अपेक्स ग्रुप के चौयरमेन इस बात का प्रमाण है कि अगर उत्साह और लग्न है तो आप हर परिस्थिति में परचम फहरा सकते हैं। चित्रकूट सहित जो दिव्यांग विवि स्थापित है तो कई देश के कई शहरों में दिव्यांगों को आगे लाने का प्रयासरत शिक्षा संस्थाएं कर रही हैं। अगर हम दिव्यांगजनों को या वो खुद आत्म निर्भर होकर रोजगार की दिशा में आगे बढ़े तो सामाजिक सोच में बदलाव आ रहे हैं उसके चलते चुनौतियों का आसानी से समाधान ढूंढ सकते हैं। क्योंकि दिव्यांगता उन लोगेां को पहचान देती है जिसे समाज पीछे छोड़ देता है। शिक्षा से इसमें आत्मविश्वास और सम्मान पैदा होगा और चित्रकूट में खुली दिव्यांग यूनिवर्सिटी जैसी संस्थाएं इनका जीवन तो बदलेगी ही इनके लिए वरदान साबित होगी। आधुनिक सुविधाओं से युक्त दिव्यांग विवि और स्कूलों का इनके लिए आगे बढ़ने में योगदान है। जब अपने पर पड़ती है तो असलियत का पता चलता है इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता और यही प्रार्थना करता हूं कि भगवान किसी को ऐसी बीमारी ना दे जिससे उनके परिवार को कोई कष्ट होता हो। अगर भगवान ने किसी के साथ ऐसा किया है तो उसके पीछे कारण रहा होगा। ऐसे में दिव्यांग साहस और उत्साह से काम करे तो वो दुनिया के हर क्षेत्र में अपनी पहचान बना सकते हैं। वर्तमान में प्रशासनिक पदों पर यह तैनात हैं। कुछ डीएम के पद पर हैं तो कुछ व्यापार में आगे बढ़ रहे हैं। समाज का सहयोग भी इन्हें खूब मिल रहा है। अब लोग हर काम में इन्हें प्राथमिकता देने लगे हैं। ऐसे में यही कहा जा सकता है कि दिव्यांगता को अभिशाप ना समझकर भगवान की मर्जी और हमारे धैर्य की परीक्षा समझकर आगे बढ़े और दिव्यांग विवि और स्कूलों के माध्यम से आगे बढ़ने का प्रयास करें। परिवार और समाज अपने आप में विवि है। जिससे सीखकर अनपढ़ पीएचडी कहलाए जा सकते हैं। दिव्यांगों को भी समाज और परिवार को प्रोत्साहन देना चाहिए। उनके आगे बढ़ने का स्वर्णिम मौका हो सकता है।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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