बचपन में एक कहावत सुनी थी कि अजब तेरी दुनिया अजब तेरा खेल छछुंदर के सिर में चमेली का तेल उस समय तो इसका सही अर्थ समझ में नहीं आता था लेकिन अब जब मीडिया में सुनने देखने और पढ़ने को समाचार मिलते हैं तो कितने ही ऐसे होते हैं जिन्हें पढ़ते ही यह एहसास होता है कि उक्त किवदंती ऐसे ही मामलों को लेकर पड़ी होगी। कुछ अफसर खेल तो खूब करते हैं यह आये दिन सरकार द्वारा कराये जा रहे विकास कार्यों आदि की होने वाली जांच में स्पष्ट हो रहा है।
कुछ वर्ष पूर्व दिल्ली से प्रकाशित नवभारत टाईम्स में एक खबर पढ़ी थी कि जबलपुर में एक अफसर ने तालाब खुदवाया दूसरे ने आकर उसे भरवा दिया क्योंकि ना तालाब खुदने की जरूरत थी और ना ही भरने की। इसी प्रकार पिछले वर्ष सर्दियों में गोमाता को सनील की झूल पहनाने की खबरें पढ़ने को मिली उस पर कितना पैसा खर्च हुआ वह तो अलग बात है लेकिन जहां आये दिन सभी प्रयासों के बावजूद गौमाता को पेट भरने के लिए सड़कों पर घूमना पड़ना है और इनके आश्रयस्थलों में अब व्यवस्था के चलते कितने ही मर जाते हैं ऐसे में सनील की झूल कितनी गौमाता को ओढ़ाई गयी होगी इसका अंदाजा कोई भी लगा सकता है लेकिन फिलहाल पंडित दीनदयाल उपाध्याय पशु चिकित्सा विश्वविद्यालय एसोसिएटस प्रो. डा. शंकर सिंह के अनुसार हाथियों को ठंडक पहुंचाने के लिए आईसक्रीम दही और उन्हंे खिलाएं जायेंगे मौसमी फल इनका कहना है कि तापमान 36 डिग्री के आसपास रहता है इनमें पसीना बाहर नहीं निकलने की गं्रथियां बहुत कम होती हैं इसलिए हाथी खुद को ठंडा नहीं रख पाते बड़े शरीर के कारण गर्मी भी धीरे से निकलती है इनके बड़े कान फड़फड़ाकर प्राकृतिक कूलिंग का काम करते हैं इससे संबंध खबर के अनुसार उत्तर भारत में बढ़ती गर्मी के बीच मथुरा के एक पुनर्वास केंद्र में बचाए गए हाथियों को ठंडक पहुंचाने के लिए आइसक्रीम, फ्रोजन फ्रूट ब्लॉक, दही, मौसमी फल दिए जा रहे हैं। अधिकारियों ने गत दिवस यह जानकारी दी। पंडित दीन दयाल उपाध्याय पशु चिकित्सा विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. शंकर सिंह ने कहा कि हाथियों का शारीरिक तापमान 36 डिग्री सेल्सियस के आसपास रहता है। उन्होंने कहा कि इनमें पसीना बाहर निकालने की ग्रंथियां बहुत कम होती हैं, इसलिए ये पसीने से खुद को ठंडा नहीं कर पाते और बड़े शरीर के कारण गर्मी धीरे निकलती है। सिंह ने कहा कि इनके बड़े कान फड़फड़ाकर प्राकृतिक कूलिंग का काम करते हैं और पानी, कीचड़ व छाया इनके लिए जरूरी है।
वाइल्डलाइफ एसओएस के सह-संस्थापक कार्तिक सत्यनारायण ने कहा कि केंद्र में 34 बचाए गए हाथी हैं, जिनमें 14 नर, 20 मादा हैं। उन्होंने कहा कि गर्मी में हाथियों की सैर सुबह जल्दी और शाम को देर से कराई जाती है ताकि दोपहर की गर्मी से बच सकें। सत्यनारायण ने कहा, “ पानी बौछारों, साफ पूल और पेयजल की नियमित सफाई से हाथियों के शरीर में जल की मात्रा संतुलित रखी जा रही है। छाया संरचनाओं और कीचड़ में स्नान से शरीर का तापमान नियंत्रित रहता है। हाथी मिट्टी में पानी मिलाकर शरीर पर लगाते हैं, जिससे गर्मी से राहत मिलती है।” पशु चिकित्सा सेवाओं के उप निदेशक डॉ. इलैयाराजा एस ने कहा कि हाथियों के आहार में फ्रोजन फ्रूट आइस पॉप्सिकल्स, दही-दलिया, ओआरएस, तरबूज, खीरा, खरबूजा, गन्ना, आम और केला शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि आहार हाथी की जरूरत के अनुसार दिया जाता है और एक हाथी को रोज करीब 100 लीटर पानी चाहिए। वन रेंजर अधिकारी अतुल तिवारी ने कहा कि हाथियों के लिए पानी बेहद जरूरी है और वे जलाशयों में समय बिताना तथा मिट्टी में नहाना पसंद करते हैं।
हम पशु चिकित्सा सेवाओं के उप निदेशकर डा. इलैयाराजा या डा. शंकर सिंह की किसी भी बात या सुझाव को गलत नहीं ठहरा नहीं हैं लेकिन वर्तमान समय में आम आदमी को ही जब शुद्ध दही और प्राकृतिक रूप से पके फल खाने को नहीं मिल रहे है और अगर मिल भी रहे है तो उन्हें ही इससे कोई फर्क नहीं पड़ता ऐसे में हाथियों को दही, आइसक्रीम मौसमी फल आदि खिलाने की जो बात हो रही है जहां तक लगता है उससे हाथी को ठंडक पहंुच पायेगी ऐसा लगता नहीं है इसलिए यह सब नागरिकों के खाने के लिए ही छोड़ दें जिससे जो थोड़ा बहुत बिना मिलावट का सामान मिल रहा है वह मिलता रहे। हाथी जी को तो प्राकृति माहौल और घने वन उपलब्ध कराने के प्रयास हो जो उनके निवास और पेट भरने के मुख्य साधन होते है ऊंट के मुंह में जीरा डालने वाली कहावत को चिरतार्थ किया गया तो सरकार का बजट तो समाप्त होगा ही इन चीजों का बाजार में भी आकाल हो सकता है। इसलिए पशु पालन अधिकारी जो प्राकृतिक व्यवस्थाएं हैं उन्हंे ही आगे बढ़ाये इन चीजों का काल उत्पन्न करने की कोशिश ना ही करें तो अच्छा है।
फिलहाल पशु पक्षियों का ध्यान रखा जाना वक्त की सबसे बड़ी मांग है लेकिन ऐसा न हो कि जो वस्तुएं इन्हंें खिलाने की बात की जा रही है वह महंगी और बाजार से गायब न हो जायें इसलिए दही, आईसक्रीम आदि नागरिकों के लिए ही छोड़ देें तो अच्छा है।
-प्रस्तुति:- अंकित बिश्नोई राष्ट्रीय महामंत्री सोशल मीडिया एसोसिएशन एसएमए व पूर्व सदस्य मजीठिया बोर्ड यूपी संपादक पत्रकार
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