34 बच्चों के यौन शोषण में निलंबित सिंचाई विभाग के जेई और उसकी पत्नी को फांसी की सजा बांदा की विशेष पाक्सो कोर्ट ने देते हुए हर बच्चे को दस दस लाख का मुआवजा देने का आदेश भी दिया। बताते चलें कि इंटरपोल ने दिल्ली स्थित सीबीआई कार्यालय में एक विशेष ईमेल शिकायत भेजी थी। जिसमें बताया गया था कि आरोपी रामभवन तीन अलग अलग मोबाइल नंबरों का उपयोग कर डार्कवेब से बच्चों के अश्लील फोटो और वीडियो विदेशों में बेच रहा है। बताते चलें कि इंटरपोल जो १९५ देशों में सक्रिय है इसलिए यह शिकायत अंतरराष्ष्ट्रीय बाल यौन शोषण के पर्दाफाश का माध्यम साबित हुई क्योंकि सीबीआई के लोक अभियोजक दारा सिंह मीणा द्वारा इंटरपोल से मिली शिकायतों के आधार पर जांच कर पुख्ता सबूत एकत्रित किए। फिर विशेष पॉक्सो अदालत के न्यायाधीश प्रदीप कुमार मिश्रा द्वारा १६३ पेज के फैसले में इस घिनौने अपराध को जघन्य करार दिया और यह मामला दोनों दोषियों को फांसी के तख्ते तक पहुंचाने का माध्यम बन गया। ३४ मासूम, ७४ गवाह और ४७ देश से संबंध इस दरिंदगी के मामले में मिली सजा का प्रकरण ०५ जून २०२३ के बाद से सामने आया। सवाल यह उठता है कि यह मामला कुछ दशक पूर्व यूपी दिल्ली सीमा के पास निठारी कांड की याद दिलाने में सक्षम नजर आ रहा है। इसलिए जो यह सजा हुई यह तो अच्छा है लेकिन एक बात जो बार बार बता रही है कि कहीं आखिरी में जाकर इस मामले का भी समापन निठारी कांड की तरह ना हो और बाल यौन शोषण रोकने के लिए सरकार को ऐसे मामलों में पैरवी करने वाले वकीलो या अपने अधिकारियों को ऐसे आदेश देने चाहिए जिससे आखिरी तक दोषी बच ना पाएं। क्योंकि ज्यादातर मामलों में देखा है कि लोगों को पॉक्सों से संबंध मामला हो या अन्य कोई पहले चरण में सजा भी मिलती है और जुर्माने भी लगते हैं लेकिन आखिरी में या जो ज्यादातर बरी हो जाते हैं यो थोड़ी सजा के बाद रिहाई हो जाती है। ऐसे मामलों को रोकने के लिए कानून तो बहुत बने हैं लेकिन ऐसी सोच वालों को उसका डर नहीं सताता। इसलिए केस डायरी ऐसी बनाकर अदालत में केस ले जाकर मजबूत पैरवी हो तो न्याय मिलना पक्का है। पिछले कुछ सालों में हुई ऐसी घटनाएं और सोशल मीडिया पर उन्हें लेकर मचने वाले बवाल के चलते सरकार इस ओर ध्यान देगी ऐसा विश्वास के साथ कहा जा सकता है। फिलहाल पॉक्सो कोर्ट के फैसले पर पीड़ित बच्चों को दस दस लाख मुआवजा और दोषियों की संपत्ति बेचकर उसका पैसा पीड़ितों में बांटने का काम जल्द हो तो अच्छा है। स्मरण रहे कि दो तीन दशक पूर्व दिल्ली में हुए नेना साहनी हत्याकांड में उस समय के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों द्वारा दोषी को फांसी दिलाने के दावे किए गए थे मगर कुछ साल बाद वह रिहा हो गया ऐसी पुनरावृति ना होने देने के लिए अगर केस की पैरवी की जाए तो कुछ अपराध रुक सकते हैं।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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