युद्ध दो देशों में हो या घर में विवाद भाईयों में हो या पड़ोसियों में सबकी जीवन की दिनचर्या और हमारे स्वास्थ्य दोनों पर ही असर पड़ता है क्योंकि इन बिंदुओं को लेकर जो सोच पनपती है वो हमें या तो विध्वंसकारी काम करने के लिए उकसाती है या डिप्रेशन में ला देती है जिसका सीधा असर परिवार पर पड़ता है और सबसे ज्यादा बच्चे प्रभावित होते हैं। लेकिन यह भी पक्का है कि आप कितना ही कोशिश कर ले लेकिन कभी ना कभी इस अभिशाप का सामना सबको ही करना पड़ता है क्योंकि भले ही आप अपनी तरफ से कोई पहल ना करे तो सामने वाला ऐसी स्थिति उत्पन्न कर देता है जो भुगतने के लिए मजबूरी हो जाती है। वैसे तो यह घर घर का किस्सा है लेकिन एम्स गोरखपुर और एमजी मेडिकल कॉलेज इंदौर के द्वारा कराए गए अध्ययन में दुनियाभर में हुए १५ शोध मेटा एनालिसिस पर आधारित एक रिसर्च अंतरराष्ट्रीय जनरल फ्यूचर हेल्थ के फरवरी अंक में प्रकाशित हुई उससे भी यह तथ्य लगभग सही साबित हो रहे हैं।
मुददा राष्ट्रीय हो या अंतरराष्ट्रीय या आपके परिवार के अंदर का जहां तक इस संदर्भ में बचपन से मैंने देखा और समझा वो यह है कि अगर हम अपने फालतू खर्च ना बढ़ाये, बोलते समय संयम रखें और मुंह से ऐसे शब्दों का उच्चारण ना होने दे जो किसी के सीने को छलनी करता हो या स्वाभिमान को चोट पहुंचाता हो। अगर हम जहां तक मैंने देखा आमदनी अठन्न्नी खर्चा रुपया को दूर कर आमदनी अठन्नी और खर्चा चवन्नी को आत्मसात कर ले तो कुछ मुुददों को लेकर जो तनाव और विवाद उत्पन्न होता है उससे बच सकते हैं। और अपने परिवार में मानसिक सेहत इन बिंदुओ को लेकर खराब होती है उससे भी बचा जा सकता है। कोई अब कहे कि घर और देश के विवाद से क्या मतलब तो मुझे लगता है कि एक ही बात अगर कोई देश का प्रमुख व्यक्ति कहे तो उसका असर समाज और अन्य देशों पर भी पड़ता है वहीं परिवार पर भी लागू होता है। अगर आप अपने बच्चों या बड़ों के सामने ऐसी कड़वी वाणी बोलते हैं जो सुनने वाले को हिलाकर रख दे तभी से विवाद शुरु हो जाता है और वो ही आगे चलकर कई कठिनाईयों के साथ खराब स्वास्थ्य का कारण बनता है इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता । कहते हैँ कि आप दीवार में छेद कर दें तो मरम्मत के बाद पता नहीं चलेगा लेकिन आपके शब्दों से छलनी सीने की भरपाई होना संभव नहीं है।
मैं बचपन से गरीबी की रेखा से नीचे जीवन यापन शुरु कर आगे बढ़ा। किसी के घर में झाडू पोछा किया तो किसी के यहां बर्तन मांजे। कई जगह मजदूरी करनी पड़ी और इस दौरान जो परिवारों में बिखराव और भाई भाई व परिजनों में जो मनमुटाव और अलगाव होते देखा उससे भी यही महसूस हुआ कि कुछ बातों पर सोच समझकर बोले और संयम से काम ले तो परिवार भी जुडे रह सकते हेैं और देशों के युद्ध पर भी लगाम लग सकती है लेकिन इसके लिए एक बात जरुरी है कि घर हो या बाहर आपको मानसिक रुप से शक्तिशाली होना होगा भले ही आप आर्थिक रूप से कमजोर क्यों ना हो। क्येांकि मजबूत सोच और दूसरों का सम्मान करने की नीयत और आपकी शक्ति विवादों को दूर रखने में भूमिका निभाती है। मैं कोई उपदेशक या प्रेरणास्त्रोत व्यक्ति नहीं हूं लेकिन जो देखा और सुना उसका अर्थ यही निकला कि गलत मत बोलो गलत मत सुनो देखो जरुर लेकिन सुधार की कोशिश करो। कुल मिलाकर यही कहना है कि सुखी परिवारों की खुशहाली के लिए अगर परिवार के सभी सदस्य अपनी नाराजगी अच्छे शब्दों में व्यक्त कर उसे दूर करने और एक दूसरे की परेशानी में साथ खड़े रहने की सोच बनाएं। तो काफी सुख शांति परिवारों में और मानसिक सेहत स्वस्थ बनी रहेगी। सुख शांति कोई धन दौलत से ही नहीं आती है। एक बार की बात है। हम परिवार में चार सदस्य थे। खाने की व्यवस्था नहीं थी। जो आटा था उसमें दो रोटियां बनी और बांटकर खा ली। उससे एक तो संतुष्टि बनी और एकसूत्र में बंधने की सोच विकसित हुई वो हर परिस्थिति में आपको तनाव से दूर रख सकती है अगर आप साफ मन से हर बात कर रहे हैं तो। व्यंग्य अच्छा हो या बुरा उसका असर बुरा ही होता है।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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