एक फरवरी को पेश होने वाले बजट की तैयारियों के अंतिम कार्य हलवा सेरेमनी हो चुकी है। इस बजट को लेकर आम नागरिकों में काफी आशा नजर आ रही है क्योंकि इसके बाद कुछ राज्यों में होने जा रहे चुनाव महत्वपूर्ण है जिसे ध्यान रखकर केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण अस्थिर वैश्विक माहौल भू राजनीतिक तनाव ऊर्जा कीमतों में तनाव और अर्थव्यवस्था में सुस्ती के बीच २०२६ का आम बजट अहम माना जा रहा है। जानकारों को कहना है कि यह बजट तय करेगा कि देश की आर्थिक व्यवस्था को कैसे मजबूती दी जा जाएगी। क्येांकि सरकार के बीच विकास और कल्याण के बीच संतुलन बनाना, रोजगार सृजन, औद्योगिक विस्तार, क्षेत्रीय संतुलन और महंगाई व आय के असमानता के दौर में गरीब वर्ग के लिए कल्याण कारी योजनाओं को समर्थन देने की चुनौती होगी। माना जा रहा है कि यह बजट समावेशी विकास का दस्तावेज माना जा सकता है जिसमें सड़क रेल बंदरगाह परिवहन और पंूजी व्यय में वृद्धि जारी रखेगी क्योंकि कुछ वर्षों में रणनीति में निजी निवेश को खींचने में सकारात्मक भूमिका निभाई है तो विनिर्माण क्षेत्र को प्रोत्साहन करने में मेक इंन इंडिया को और प्रभावी बनाने में जोर दिया जा सकता है। बजट से मध्यम वर्ग को भी काफी आशा है विशेषकर आयकर ढांचे में प्रस्तावित संसोशन मानक कटौती में बढ़ोत्तरी बचत को प्रोत्साहन को बल मिल सकेगा। बजट कृषि क्षेत्र के लिए भी निर्णायक साबित होगा क्योंकि जलवायु परिवर्तन बढ़ती लागत किसानों की स्थिर आय जैसी चुनौतियां लगातार सामने आ रही है ऐसे में सिंचाई फसल बीमा कृषि प्रसंस्कारण और ग्रामीण बुनियादी ढांचे पर नए प्रावधानों की संभावना जताई जा रही है। हरित ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में निवेश को बँढ़ाकर सरकार भविष्य की नींच मजबूत करना चाहेगी तो विपक्ष कमियां ढूंढने में कोई कोर कसर नहीं रखेगा लेकिन सरकार का प्रयास होगा कि बजट केवल आंकड़ों का दस्तावेज ना होकर दूरदर्शी रुपरेखा पेश करे जिससे अस्थिरता के दौर में भारत स्थिर आत्मनिर्भर विकास की दिशा में आगे बढ़ सके।
अगर दूसरे दृष्टिकोण से सोचें तो को एक दशक में भारतीय अर्थव्यवस्था में जिस तेजी से अपना आकार बढ़ाया है उसने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है। सरकार भी विकास की गति को बनाए रखते हुए आत्मनिर्भर भारत निवेश को बढ़ावा दिया जा सकता है मगर इसमें चुनौती यह है कि देश पर कर्ज का बोझ निरंतर बढ़ता जा रहा है इसे नजरअंदाज करना ठीक नहीं है। पिछले एक दशक में कर्ज ५३ लाख करोड़ से बढ़कर १८३ लाख करोड़ तक पहुंच गया है और आगे चलकर इसमें जो बढ़ोत्तरी होनी है उससे यह १९६ से २०० लाख करोड़ के बीच पहुंच गया होगा। इससे भी ज्यादा चिंताजनक है कि करीब १२ लाख करोड़ हर साल ब्याज चुकाने में ही सरकार को खर्च करने पड़ रहे है जिससे विकास कार्योँ की जगह इतना पैसा पुराने कर्ज की भरपाई में ही खर्च हो जाता है। इसलिए यह स्थिति लंबे समय तक विकास के रफ्तार पर ब्रेक लगाने का कारण भी बन सकती है। इटली जैसे देश भारत से कहीं अधिक कर्जदार हो लेकिन विकासशील देश के लिए कर्ज का संतुलन बनाए रखना ज्यादा जरुरी हो जाता है। पिछले १२ साल में केंद्र सरकार का बजट १५ लाख करोड़ से बढ़कर ५० लाख करोड़ पहुंच चुका है और इसमें १० प्रतिशत की भी बढ़ोत्तरी हो सकती है।
सरकार कोई भी हो उसका प्रयास यही रहता है कि ज्यादा से ज्यादा आमदनी हो लेकिन फिलहाल जो परिस्थितियां है उसमें सरकार को काफी मशक्कत करनी होगी। क्योंकि कुछ विधानसभाओं के चुनावों में अपनी स्थिति मजबूत रखने के लिए सुविधाएं बढ़ाने का प्रयास भी किया जा सकता है। ऐसे में बजट कहां से आएगा यह सोच महत्वपूर्ण है। क्योंकि सरकारी अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के खर्चे बढ़ते ही जा रहे हैं। इस बजट में व्यापारी और किसान चाहते हैं कि सुविधाएं बढ़ें और आय की सीमा बढ़ाई जाए। मजीठियां बोर्ड यूपी के पूर्व सदस्य सोशल मीडिया एसोसिएशन एसएमए के राष्ट्रीय महामंत्री अंकित बिश्नोई व इसके नेशनल चेयरमैन सुनील डांग का कहना है कि पिछले १४ सालों से भाषाई लघु समाचार पत्रों की अवहेलना सरकार द्वारा की जा रही है जो अब नहीं होनी चाहिए। बजट में समाचार पत्रों को विज्ञापन का बजट का ७५ प्रतिशत हिस्सा लघु समाचार पत्रों को दिया जाए क्योंकि चुनाव या देश की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने में इस वर्ग के समाचार पत्र संचालकों का बहुत योगदान होता है और सरकार जब हर क्षेत्र में सब्सिडी दे रही है तो लघु समाचार पत्रों को नजर अंदाज क्यों किया जा रहा है।
मेरा मानना है कि सरकार अपने खर्चों और नौकरशाहों की फिजूलखर्ची पर रोक लगाए और सभी वर्गों को सुविधाएं देकर संतुष्ट करना है और सरकार को अपनी लोकप्रियता बनाए रखनी है तो जनहित के काम होने जरुरी है। सड़क स्वास्थ्य भोजन हर किसी को मिले इसके लिए आमदनी में बढ़ोत्तरी और खर्चों में कमी वक्त की मांग है। बाकी तो २०२७ के विधानसभा और २०२९ के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर रणनीति तैयार करने के साथ साथ बढ़ते कर्ज पर भी रोक लगाई जाए। मगर व्यापारी किसान व असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की खुशहाली के लिए भी आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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