आवारा हिंसक जानवरों के आतंक से नागरिकों को बचाने के लिए अदालत द्वारा कई महत्वपूर्ण आदेश किए गए हैं। जिन्हें सरकार ने भी अधिकारियों को कार्रवाई के निर्देश दिए। वन व अन्य विभागों के पालन ना करने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई का प्रावधान हो चुका है और गलत संरक्षण देने वालों के खिलाफ भी कार्रवाई की संस्तुति हुई बताते हैं। लेकिन अंधेर नगरी चौपट राजा की किवंदती को लागू करने में हिंसक जानवरों से मुक्ति दिलाने वाले कहां सो रहे हैं क्योकि एक भी दिन ऐसा नहीं जाता जब खबरों में कुत्तों बंदरों द्वारा लोगों को काटने या मारने व सांड के हमलों की खबरें ना मिलती हो। लोग परेशान है तो जिन्हें इस आतंक को रोकना है उन्हें पता ना हो ऐसा संभव नहीं है तो फिर क्या कारण है कि नागरिक मर रहे हैं और घायल हो रहे हैं लेकिन इन हिसंक जानवरों और उन्हें पालने वालों को क्यों बख्शा जा रहा है। मेरा मानना है कि पीड़ितों को इंजेक् शन लगवाने तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए। जो अधिकार हमें मिले हैं उनका उपयोग कर इन जानवरों को पालने वालों की सूचना जिलाधिकारी व थाने को दें। इन घटनाओं को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएं वरना वो दिन आते देर नहीं लगेगी जब इन जानवरों के कारण हम घर से निकलना ही बंद कर देंगे। ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि कई बार सुनने को मिला कि कॉलोनियों के निवासी भी यह कहकर कि यहां कुत्ते बहुत मिलेंगे अपना रास्ता बदल लेते हैं। मेंटीनेंस कंपनियां इन कुत्तों को बाहर छोड़ आते हैं लेकिन यह फिर वापस आ जाते हैं। अब यह व्यवस्था करने पड़ेगी जिससे लोगों को जान से हाथ ना धोना पड़े। मैं यह नहीं कहता कि इन जानवरों को मारा जाए लेकिन सरकार और इन्हें पालने वाले ऐसी व्यवस्था करें कि यह आवारा ना घूमें। कोई ऐसा नहीं करता तो एफआईआर दर्ज कर जुर्माना लगाया जाए और विभाग के अफसरों को जागरुकता अभियान चलाना चाहिए जिससे कुत्तों को पालने वालों की सूचना मांगी जाए तभी इस समस्या का समाधान हो सकता है क्योकि कुत्तों बंदरों सांडों के साथ गुलदारों के शहर में आने की सूचनाएं मिलने लगी है। इन्हें रोकना जरुरी है।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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