Date: 21/02/2024, Time:

सबके मोदी जी हमें क्यों भूल गए, सत्ता पक्ष ने बजट को सराहा, विपक्ष ने की आलोचना; लघु और भाषाई समाचार पत्र संचालकों को इस बार भी भूल गईं वित्त मंत्री

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प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा हर क्षेत्र में अपनाई जा रही सोशल इंजीनियरिंग को ध्यान में रखते हुए पीएम मोदी द्वारा बताए गए पांच दिशा निर्देशों को आत्मसात कर केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा 47.66 लाख करोड़ का बजट पेश किया गया। मजे की बात खबरों के अनुसार यह नजर आई कि पूरे बजट में विपक्ष लगभग शांत और सत्तापक्ष सक्रिय बना रहा। सत्ताधारी दल के नेताओं के हवाले से छप रही खबरों में स्वर्णिम भारत का संकल्प होगा यह बजट क्योंकि खुद पर भरोसा रख पेश किया गया। इससे समावेशी विकास की उम्मीद बढ़ी। कुछ का कहना था कि सरकार ने 2019 में जो लुभावना बजट पेश किया था यह उससे बिल्कुल अलग रहा। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का कहना है कि परिपूर्ण है तो गृहमंत्री अमित शाह का कहना है कि इससे नए अवसर खुलेंगे। बुनियादी ढांचा 11 लाख करोड़ के शगुन से होगा मजबूत।
जनहित में है रेल/शिक्षा और स्वास्थ्य
जो भी सरकार बजट पेश करती है चाहें वह प्रदेश का हो या केंद्र का उसके अनुसा वह लगभग जनहित का ही होता है। और यह भी पक्का है कि सबको कोई भी खुश नहीं कर सकता। शायद इसीलिए सत्ता पक्ष इस बजट को महिलाओं किसानों युवाओं और व्यापारियों तथा गरीबों के हित का बता रहा है तो सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव का कहना है कि बजट जनविरोधी है। अन्य विपक्ष के नेता इसे लेकर आग बबूला है। व्यापारी निराश है। कुछ इसको पंूजीपति और उद्योगपतियों का बजट बता रहे हैं तो कुछ विपक्ष के नेता कह रहे हैं कि इसमें गरीबों की अनदेखी की गई है। भाकियू नेता राकेश टिकैत और नरेश टिकैत ने इस बजट को महिला व किसान विरोधी बताया है। सरकार की ओर से कहा जा रहा है कि तीन करोड़ महिलाएं लखपति बनेंगी। तो विपक्ष के नेताओं का कहना है कि यह सब धोखा और आंकड़ेबाजी है। बजट में रक्षा, रेल, शिक्षा, सवाईकल कैंसर जैसे क्षेत्रों के साथ साथ राष्ट्रपति भवन तथा स्वागत सत्कार का बजट भी बढ़ाया गया है। जहां तक मुझे लगता है इसमें कुछ गलत भी हीं है। क्योंकि राष्ट्रपति भवन की गरिमा ओर अतिथियों के सत्कार से देश की गरिमा जुड़ी हुई है और रेल व शिक्षा आम आदमी से जुड़े हैं। जनसंख्या समाधान फाउंडेशन ने कहा कि यह जनसंख्या नियंत्रण के आड़े नहीं आएगा। कुछ कॉलेजों में मेडिकल कॉलेजो की स्थापना अच्छी व्यवस्था है।
मुफ्त बिजली
लेकिन 13.50 लाख लोगों को तीन सौ यूनिट बिजली फ्री देने की बात कही गई है। मुझे लगता है कि इससे आम आदमी पर टैक्सों का बोझ बढ़ेगा क्योंकि सरकार के पास ऐसा खजाना नहीं है जिससे मुफत बिजली देने से होने वाले घाटे को पूरा किया जा सके। मुझे लगता है कि अगर सरकार इसे चुनावी बजट ना बनाकर हर आदमी के हित का ध्यान रखती तो और ज्यादा अच्छा था। जहां तक पक्ष विपक्ष की बात है तो इन्हें प्रशंसा और आलोचना करनी ही है। और वो इनके द्वारा की ही जा रही है।
डॉक्टरों को क्यों मिले छूट
बजट को लेकर कुछ डॉक्टरों और उनके संगठनों द्वारा कहा जा रहा है कि चिकित्सा संबंधी यंत्र यातायात में शुल्क की छूट देनी चाहिए थी। कोई इनसे पूछे क्यों। मोटी फीस ले रहे हो। कहते हो सरकार हमारी फीस तय नहीं कर सकती। डॉक्टरों की इस प्रकार मांग करना भी देशहित में नहीं कह सकते। क्योंकि हर प्रकार की छूट बड़े लोगों को दी जाती रहेगी तो देश के विकास के लिए धन कहां से आएगा।
लघु और भाषाई समाचार पत्रों के लिए कुछ नहीं किया
केंद्र सरकार ने अगर देखें तो इस बार भी लघु और भाषाई समाचार पत्र संचालकों के उत्थान और विकास के लिए कुछ नहीं किया है। क्योंकि इस बारे में कहीं भी पढ़ने को एक शब्द भी नहीं मिला। माननीय पीएम साहब वित्त मंत्री ने आपके पांच सूत्रों को आत्मसात कर सबका हित का कहे जाने वाला यह बजट पेश किया तो क्या सब में देश की आजादी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने और सामाजिक कुरीतियों के विरूद्ध आवाज उठाने वाले और सरकारी योजनाओं को घर घर तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे मीडिया के लिए सरकार की कोई जिम्मेदारी नहीं है। कुल मिलाकर यह कह सकते हैं कि पीएम मोदी की सलाह पर प्रस्तुत बजट में लघु और भाषाई समाचार पत्रों को पूर्ण रूप से नजरअंदाज किया है। पीएम साहब लाखों की संख्या में देश में मौजूद इस वर्ग से संबंध मीडिया के लोग भले ही मतों के आधार पर चुनाव को प्रभावित ना कर पाते हो लेकिन अपनी लेखन शक्ति से इनके द्वारा बहुत बडी रददोबदल भी की जा सकती है मगर क्योंकि पीएम के द्वारा किए जा रहे कार्यों और निर्णयों और दुनिया में देश की बढ़़ाई जा रही गरिमा को ध्यान में रखते हुए इस वर्ग का मीडिया संचालक भी उनका प्रशसंक है विरोधी नहीं। इसलिए जब भी चुनाव आते हैं यह वर्ग पीएम की कार्य नीति को ध्यान में रखते हुए विरोध नहीं कर पाता है। इन बातों को ध्यान में रखते हुए बंदी के कगार पर पहुंच रहे लघु भाषाई समाचार पत्रों की उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए इनका आर्थिक और हुक्मरानों द्वारा मानसिक उत्पीड़न बंद होना चाहिए क्योंकि आप हमेशा सबको साथ लेकर चलने के पक्षधर हैं तो इन्हें क्यों छोड़ा जा रहा है। यह बात दिमाग में उथल पुथल मचा रही है कि सबके मोदी जी आखिर हमें क्यों भूल गए।

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