Date: 22/04/2024, Time:

पंडित गौरीदत्त शर्मा आदि की खड़ी बोली है सम्मान और पहचान का प्रतीक

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आज हम विश्व मातृभाषा दिवस मना रहे हैं। सांपद्रायिक सदभाव और सभी धर्मों और भाषाओं के प्रति पूर्ण सम्मान की भावना हमारे देश में सर्वोपरि है। इसीलिए हर क्षेत्र में बोली जाने वाली अलग अलग भाषाओं को सम्मान देने के साथ ही संस्कृत हिंदी उर्दू और खड़ी बोली को विशेष महत्व मिला हुआ है। जहां तक बात करें हिंदी हमारी भावनाओं से जुड़ी है इसलिए मातृ और राष्ट्र भाषा है। उर्दु सभी जाति वर्ग में बोली जाती है और लोग इसके प्रति आकर्षित रहते हैं इसलिए यह और संस्कृत सर्वोपरि है। खैर जो भी हो हिंदी तो अब देश की सीमाओं से निकलकर अन्य देशों में भी अपने पैर पसार रही है। इसकी और संस्कृत की मांग हर क्षेत्र में बढ़ रही है। विदेशी कंपनियां भारत के बाजार को ध्यान में रखकर हिंदी में बनवा रहे हैं तथा अपने विज्ञापन तैयार करवा रहे हैं। इसलिए धीरे धीरे हिंदी भी अंग्रेजी के समान विश्व भाषा का रूप जल्दी ही लेगी यह बात विश्वास से कह सकते हैं। हम बात पश्चिमी उप्र में बोली जाने वाली खड़ी बोली की करें तो भले ही कान्वेंट कलचर से शिक्षा प्राप्त बच्चों की समझ में उसका अर्थ ना आ पाता हो लेकिन खड़ी बोली का चार्म और उसका अकखड़पन के चलते फिल्मों व सीरियल और युवाओं में यह खूब बोली जाती है। बताते चलेंं कि खड़ी बोली में वैसे तो बहुत साहित्यकारों का योगदान है लेकिन मेरठ के जाने माने स्वतंत्रता सेनानी पंडित गौरीदत्त शर्मा कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर आचार्य क्षेमचंद सुमन पदम सिंह शर्मा, कमलेश दुष्यंत कुमार कृष्ण चंद शर्मा, डॉ. चंद्रपाल, सुदर्शन, धर्मप्रकाश और अशोक मैत्रे नाम प्रमुखता से लिए जाते हैं। कुल मिलाकर यह कह सकते हैं कि खड़ी बोली में पश्चिमी उप्र हरियाणा उत्तराखंड मेरठ आदि का प्रमुख स्थान है क्योंकि जाट बाहुल्य क्षेत्र बागपत आदि भी पहले इसी में शामिल था और वहां ज्यादातर ठेट खड़ी बोली आज भी बोलते हैं।
न्याणा, खड़का, बत्तो, नाक्का, धप्पल देना, धकड़-धकड़ होणा, दखणा और दड़ मार कै पड़ रहणा। ग्रामीण संस्कृति में पले-बढ़े या गांवों से जुड़े लोगों को छोड़ कान्वेंट कल्चर की यह पीढ़ी ठेठ हिन्दी के इन शब्दों का भावार्थ शायद ही समझ पाए।
खड़ी बोली के इन शब्दों की पृष्टभूमि मेरठ, गाजियाबाद, बुलंदशहर, हापुड़, बागपत, बिजनौर, मुरादाबाद, संभल, अमरोहा, शामली, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, देहरादून एवं नैनीताल के मैदानी भाग, हरियाणा और अंबाला से लगता क्षेत्र शामिल है। इसमें भी मेरठ की खड़ी बोली आदर्श खड़ी बोली मानी जाती है।
खड़ी बोली के चर्चित मुहावरे-लोकोक्ति
तू भी राणी, मै भी राणी, कौण भरेगा पाणी
हींग लगै ना फिटकरी, रंग भी चौख्या-चौख्या होय
थोथा चना, बाजै घणा
नौते बामण भूखै मरणा
यह भी समझिए
वास्तव में कौरवी कुरु जनपद की भाषा रही है और खड़ी बोली की बात करें तो यह हरियाणा राज्य क्षेत्र में अधिक बोली जाती है। कौरवी व खड़ी बोली के शब्दों में काफी अंतर हैं। आज की हिंदी मूलत कौरवी पर ही आधारित है। इसमे बहुत सारे लोक गीत, नाटिकाएं, पहेलियां भी लिखी गई है।
समझिए न्याणा, बत्तो खड़का का मतलब
न्याणा का मतलब उस एक पतली रस्सी से है जो गाय या भैंस का दूध निकालते वक्त पिछले पैरों में बांधी जाती है। शोर को खड़का और ज्यादा बात करने वाले को बत्तो कहा जाता है। खेत में राजवाहा या ट्यूबवेल से पानी को प्रवेश देने के लिए खेत की मेढ़ काटकर बनाई जगह नाक्का है। किसी के साथ छल करने का अर्थ धप्पल देने से है। धकड़-धकड़ होणा यानी डर लगना। दड़ मार कै पड़ रहणा का अर्थ है कि नींद नहीं आने के बावजूद नींद का नाटक करना। और कॉन्वेंट कल्चर में हम जिसे हॉट करते हैं, वही खड़ी बोली में उसे तत्ता कहकर पुकारते हैं। दखणा दक्षिणी दिशा का सूचक है।
कौरवी भाषा के 20 हजार शब्दों का कोश बनेगा
कौरवी भाषा पर पिछले 10 साल से शोध चल रहा है ताकि इन सभी कौरवी शब्दों का एक कोश तैयार हो सके। इतिहासकार डॉ अमित राय जैन कहते हैं कि तकरीबन 20 हजार शब्दों का एक शब्दकोश तैयार किया जा रहा है।
खड़ी बोली ये साहित्यकार हुए चिह्नित
पंडित गौरीदत्त शर्मा, कन्हैया लाल मिश्र प्रभाकर, आचार्य क्षेमचंद्र सुमन, से.रा. यात्री, पदम सिंह शर्मा कमलेश, दुष्यंत कुमार, कृष्ण चंद शर्मा, डॉ.चंद्रपाल सिंह, सुदर्शन नारंग, धर्मप्रकाश अकेला, अशोक मैत्रे प्रमुख हैं।
विवि में हुआ है खड़ी बोली पर काम
चौ. चरण सिंह विवि में खड़ी बोली के व्याकरण, शब्दकोश एवं शब्द संपदा पर काम किया है। विवि के हिन्दी विभाग में यूजीसी से बाकायदा खड़ी बोली पर प्रोजेक्ट मिला। इसमें पूरे क्षेत्र में खड़ी बोली के शब्दों को संग्रहित करते हुए कोश की रचना की गई। खड़ी बोली के साहित्यकारों के योगदान को भी विवि ने 2008-2010 तक एकत्रित किया। विवि में कौरवी लोक साहित्य पाठ्यक्रम का हिस्सा है।
इन शब्दों पर चल रहा शोध
म्हारा, थारा, कुक्कर, जुक्कर, इंघे, उंघे, मढ़ना जैसे सैकड़ों शब्द हैं जिनपर पिछले 10 सालों से विशेष शोध कार्य किया जा रहा है। डॉ. केके शर्मा, डॉ. अमित पाठक इस प्रयास में जुटे हुए हैं।
कुल मिलाकर कहने का मतलब सिर्फ इतना है कि हिंदी जोड़ने वाली भाषा है तोड़ने वाली नहीं। इसलिए इसको सर्वमान्य मानकर हम बढ़े तो इसके विकास में बाजारवाद का तो अहम रोल है ही। समाज भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है। खड़ी बोली को हम और बढ़ाएं तो भावी पीढ़ी में लोकप्रिय होगी और इसके कुछ शब्द व्यवसाय के महत्वपूर्ण हो सकते है।

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