Date: 28/02/2024, Time:

सपा कांग्रेस रालोद लोकसभा चुनाव में कर सकते हैं अच्छा प्रदर्शन, जयंत जी जो भी फैसला करना है ?

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वैसे तो राजनीति में कब क्या हो जाए इसका अनुमान कभी भी कोई भी नहीं लगाया जा सकता। लेकिन पिछले कुछ दशकों में सत्ता और मंत्री पद के लिए उखाड़ पछाड़ की जो मुहिम शुरू हुई और एक दूसरे को गाली देने और उसकी कमियां गिनाने वाले गलबहियां करने लगे तब से तो धर्मधोरा बिल्कुल ही लगभग समाप्त हो गया। अभी पिछले दिनों दल बदल पर रोक के संदर्भ में कार्रवाई की बात सत्ताधारी दल के एक बड़े व्यक्ति द्वारा की गई थी। मुझे लगता है कि अगर उस पर अमल नहीं हुआ तो इस क्षेत्र में विश्वास तो पूरी तौर पर ही धीरे धीरे समाप्त हो जाएगा।
फिलहाल अगर हम बात पिछले यूपी विधानसभा चुनाव मिलकर लड़े रालोद और सपा की करें तो उसमें दोनों को ही लाभ हुआ था लेकिन रालोद मुखिया जयंत चौधरी काफी फायदे में रहे थे क्योंकि एक तो उनके कई विधायक जीते और सपा ने उन्हें राज्यसभा में भी भेज दिया। कुल मिलाकर केंद्र और प्रदेश दोनों जगह उनका प्रतिनिधित्व तय हुआ लेकिन अब जिस प्रकार से रालोद नेता के भगवा होने की बात चल रही है उसको लेकर रालोद के राष्ट्रीय महासचिव त्रिलोक त्यागी का कहना है कि यह सब अफवाहें है। ऐसा कुछ होने वाला नहीं है। यही बात रालोद के यूपी अध्यक्ष रामाशीष राय कह रहे है कि रालोद के एनडीए में जाने की बात कोरी अफवाह है। रालोद पूरी दृढ़ता के साथ इंडिया गठबंधन का हिस्सा है। मेरा मानना है कि अगर यही बात सही हो तो ज्यादा अच्छा है। क्योंकि पूर्व में लोकदल ने भाजपा के साथ 2009 में मिलकर चुनाव लड़ा था। लेकिन वो गठबंधन कोई बहुत दिनों तक नहीं बना रह पाया। मगर एक बात विश्वास से कही जा सकती है कि अगर सपा और रालोद एक संग खड़े रहते हैं तो सीटों को लेकर जो विवाद की बात कही जा रही है। मुझे लगता है कि बिजनौर मुजफ्फरनगर आदि की सीटों पर भी सपा मुखिया नरम पड़ सकते हैं। बस एक बार मजबूती के साथ जयंत चौधरी को भगवा में ना जाने की बात कहनी है। अगर यह दोनों साथ बने रहते हैं तो वर्तमान हालातों में 2017 को भूल राहुल गांधी और अखिलेश यादव भी एक साथ आ सकते हैं। और क्योंकि सपा मुखिया ने कांग्रेस के राहुल गांधी की यात्रा में शामिल होने की बात कही है तो कुछ सीटों को लेकर जो परेशानियां सामने आ रही हैं दिल मिलते ही हर समस्या का समाधान हो सकता है। क्योंकि यूपी के पूर्व सीएम अखिलेश यादव अड़ने वाले नहीं सुलझे विचारों के नेता हैं। इस कारण से कैराना मुजफ्फरनगर बागपत, हाथरस मेरठ मथुरा अमरोहा आदि के साथ ही कांग्रेस जो सीटें चाहती हैं उन पर भी सूझबूझ भरा फैसला ले सकते हैं। मेरा मानना है कि मेरठ-हापुड़ लोकसभा क्षेत्र से कांग्रेस और रालोद को दावेदारी करनी ही नहीं चाहिए क्योंकि यहां से सपा के कई विधायक चुने हुए हैं और उनका असर भी दिखाई देता है। अगर कोई करिश्मा लोकसभा चुनाव में कर सकता है तो भाजपा के समक्ष सिर्फ सपा उम्मीदवार ही टिक पाएगा। यह बात कहने में कोई हर्ज महसूस नहीं होता है। सबसे बड़ी बात नीतीश कुमार के जाने के बाद गठबंधन में जो कमजोरी महसूस की जा रही है सपा कांग्रेस और रालोद के एक साथ आने से यूपी में इनकी स्थिति काफी मजबूत होगी। और यह किसी से छिपा नहीं है कि आज भी केंद्र में सरकार बनने के समीकरण यूपी से ही निकलकर तय होते हैं। अखिलेश जी जयंत जी राहुल गांधी राष्ट्रीय स्तर की पार्टी के नेता है और देश में इसी पार्टी के ज्यादातर उम्मीदवार जीतकर भी आते हैं। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए फिलहाल आप अपने तीनों दलों के टिकटों की स्थिति साफ करिये या फिर यह फैसला एक समिति बनाकर उस पर छोड़ दिया जाए। कि जो फैसला वो करे वो सब माने। ना कोई एक दूसरे से छोटा ना बड़ा। अगर कुछ पाना है अगले लोकसभा चुनाव में और अपनी स्थिति मजबूत दर्शानी है तो पहल आपको करनी चाहिए। क्योंकि अखिलेश यादव ने आपको राज्यसभा पहुंचाकर अपना हक अदा कर दिया अब बारी आपकी है। जहां तक 12 फरवरी की छपरौली सभा और पूर्व मंत्री चौधरी अजित सिंह की प्रतिमा के अनावरण की बात है तो मेरा मानना है कि इसे भाजपा में जाने का संकेत नहीं समझना चाहिए। क्योंकि और भी बहुत कारण हो सकते हैं। लेकिन रालोद का राजनीतिक भविष्य अगर ध्यान से देखें तो कांग्रेस और सपा के साथ ही बनता है। अगर सबकुछ सही चला तो यह चार पांच सीटें आसानी से जीत सकते हैं। यह भी पक्का है कि भाजपा भी इससे ज्यादा रालोद को कुछ देने वाली नहीं है। यह है कि अगर भाजपा सरकार बनाती है और जयंत साथ होकर चुनाव लड़ती है तो उन्हें केंद्र में मंत्री पद जरूर मिल सकता है। मगर दूसरी तरफ देखें तो विपक्षी दलों को अच्छी सीटें मिलती हैं और वो मजबूत होता है तो विपक्षी गठबंधन के नेता के रूप में जयंत चौधरी का कद काफी बड़ा होकर उभरेगा। इसलिए ज्यादा सोच विचार ना करके रालोद मुखिया को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। भाजपा में जाना है या विपक्ष में रहना है।

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