Date: 30/05/2024, Time:

दल बदलु कब तक चखेगें सत्ता का स्वाद, क्या कैडर वाले दरी बिछाने और नारे लगाने का काम करते रहेंगे, उन्हें कब मिलेगा मौका

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देश में राजनीतिक दलों की भरमार है। कुछ क्षेत्रीय है तो कई तो प्रदेश स्तर या सिर्फ जिला और मंडलों तक सिमटे हुए है। राष्ट्रीय दल तो सक्रिय नजर आते हैं और इनके पास कार्यकर्ताओं का भी कोई अभाव नहीं है।
राजनीतिक दलों में दल बदलकर आने जाने वाले कार्यकर्ता विधायक सांसदों का सिलसिला आज से नहीं पिछले कई दशक से चला आ रहा है लेकिन वर्तमान में इसमें ज्यादा तेजी आई है।
भले ही दल में आने वालों को नया दल कुछ ना दे या इनके आने से जिस दल में यह शामिल होते हैं उसे बड़ा फायदा ना हो मगर इनकी संख्या बढ़ती ही जा रही है और कभी कभी तो पूरी छोटा दल ही इनमें समाहित हो जाती है या समझौता कर लेती है। ऐसे मे इन दलों के कार्यकर्ताओं का मानसिक और सामाजिक उत्पीड़न होने से इनकार नहीं किया जा सकता।
जब कोई व्यक्ति किसी दल में झाड़ू लगाने या दरी बिछाने का काम करता है तो वह उच्च स्तर पर पहुंचने के सपने देखने लगता है। और पार्टी मुखिया भी कैडर की बात कर उनके सपनों को पंख लगा देते हैं इससे उम्मीद बंधती है कि देर सवेर उन्हें भी मौका मिलेगा लेकिन इन दल बदलुओं को नई पार्टी में कोई लाभ ना हो लेकिन पार्टी कार्यकर्ताओं का मन अब कुंद होने लगा है और वो मानसिक रूप से ठगा महसूस करने लगते हैं। जो पद पार्टी या सरकार या मंत्रालय की कमेटियों मं उन्हें मिलने चाहे वो दलबदलुओं को मिल जाते हैं और वो मुंह ताकते रह जाते है।
यह व्यवस्था किसी एक दल में नहीं सब में है। राष्ट्रीय स्तर की पार्टियां भी दल बदल कराने में पीछे नहीं है। ऐसे में सवाल यह भी उठता है और पार्टी के वफादार भी सोचने लगे हैं कि आखिर कैडर वालों को कब मिलेगा मौका और दल बदलु कब तक चखते रहेंगे सत्ता का स्वाद।

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