नई दिल्ली, 02 फरवरी। मनुष्य का अस्तित्व तीन तलों में विभाजित है शरीर, बुद्धि, हृदय या दूसरी तरह से कहें तो कर्म, विचार और भाव। इन तीनों तलों से स्वयं की यात्रा हो सकती है। स्थूलतम यात्रा होगी कर्मवाद की। इसलिए धर्म के जगत में कर्मकांड स्थूलतम प्रक्रिया है। दूसरा द्वार होगा ज्ञान का, विचार का, चिंतन-मनन।
दूसरा द्वार पहले से ज्यादा सूक्ष्म है। दूसरे द्वार का नाम है, ज्ञानयोग। तीसरा द्वार सूक्ष्मातिसूक्ष्म है भाव का, प्रीति का, प्रार्थना का। उस तीसरे द्वार का नाम भक्तियोग है। कर्म से भी लोग पहुंचते हैं, लेकिन बड़ी लंबी यात्रा है। ज्ञान से भी लोग पहुंचते हैं, पर यात्रा संक्षिप्त नहीं है। बहुत सीढिय़ां पार करनी पड़ती हैं। पहले से कम, लेकिन तीसरे की दृष्टि में बहुत ज्यादा। भक्ति छलांग है। सीढिय़ां भी नहीं हैं, दूरी भी नहीं है। भक्ति एक क्षण में घट सकती है। भक्ति तत्क्षण घट सकती है। भक्ति केवल भाव की बात है। इधर भाव, उधर रूपांतरण।
कर्म में तो कुछ करना होगा, विचार में कुछ सोचना होगा, भक्ति में न सोचना है, न करना है, होना है। इसलिए भक्ति को सर्वश्रेष्ठ कहा है। ज्ञान का मार्ग संकीर्ण है, भक्ति का मार्ग विराट है। अगर भक्तों से तुम्हारा जोड़ मिल जाए, तो फिर तुम किसी और की चिंता मत करना। न मिले दुर्भाग्यवश तो फिर तुम कोई और मार्ग खोजना। प्रार्थना बन सकती है, प्रेम बन सकता है, तो चूकना मत, क्योंकि वह सुगमतम है, स्वाभाविक है। स्नेह तुम्हारे भीतर है, थोड़ा-बहुत प्रेम भी तुम्हारे भीतर है, थोड़ी-बहुत श्रद्धा भी तुम्हारे भीतर है, इन्हीं को थोड़ा निखार लेना है फिर ये प्रीति बन जाएंगे और प्रीति की ही अंतिम पराकाष्ठा भक्ति है।
भक्ति के मार्ग पर तुम्हारे पास संपत्ति पहले से कुछ है, तुम एकदम भिखारी नहीं हो। कुछ है तुम्हारे पास, थोड़ा निखारना है, थोड़ा साफ-सुथरा करना है जरूर, लेकिन कुछ तुम्हारे पास है। ज्ञान के मार्ग पर तुम्हारे पास कुछ भी नहीं है। वहां तो तुम्हें अ ब स से शुरू करना पड़ेगा। ज्ञान का मार्ग आदमी की खोज है और भक्ति का मार्ग प्रभु का प्रसाद है। वह तुम्हें दिया ही हुआ है। तुम्हारे भीतर एक स्वाभाविक संपदा पड़ी है, जिसको तुम बढ़ाते ही नहीं। तुम्हारी हालत ऐसे है जैसे कोई बीज वृक्षों से भीख मांगता फिरता हो कि एक फूल मुझे दे दो कि एक पत्ता मुझे दे दो, कि थोड़ी देर मैं भी तुम्हारे पत्ते से हरा हो लूं, तुम्हारे फूल के नीचे दब कर मैं भी खुश हो लूं। एक बीज, जो कि खुद जमीन में गिर जाए और टूट जाए तो बड़ा वृक्ष पैदा हो और जिसमें हजारों, लाखों पत्ते लगें, बड़ी हरियाली हो और बड़े फूल खिलें, बीज भीख मांग रहा है। ऐसे तुम बीज हो और तुम भीख मांग रहे हो।
तुम लक्ष्मीनारायण हो सकते हो, लेकिन दरिद्रनारायण बने हो और जब तक तुमने अपने को दरिद्रनारायण मान रखा है और इसमें ही मजा ले रहे हो, तब तक तो बहुत मुश्किल है, तब तक तो बड़ी कठिनाई है। तुम लक्ष्मीनारायण हो। सारी संपदा तुम्हारी है। सारे जगत का ऐश्वर्य तुम्हारा है। सारे फूल, सारे चांद-तारे तुम्हारे हैं। सब मिल सकता है एक तुम खो जाओ। इतनी कीमत चुका दो। भक्ति का सारा सार इतनी छोटी सी बात में है भक्त मिट जाए, तो भगवान हो जाए। शांडिल्य को खूब हृदयपूर्वक समझना। शांडिल्य बडा़ स्वाभाविक सहज योग प्रस्तावित कर रहे हैं। जो सहज है, वही सत्य है। जो असहज हो, उससे सावधान रहना। असहज में उलझे, तो जटिलताएं पैदा कर लोगे। सहज से चले तो बिना अड़चन के पहुंच जाओगे। एक-एक सूत्र ऐसा बहुमूल्य है कि तुम पूरे जीवन भी चुकाना चाहो, तो उसकी कीमत नहीं चुकाई जा सकती।
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