Date: 22/04/2024, Time:

अखिलेश यादव आजमगढ़ से लड़ेंगे लोकसभा चुनाव!

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लखनऊ 28 फरवरी। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव आजमगढ़ से लोकसभा चुनाव 2024 लड़ेंगे. आजमगढ़ से गुड्डू जमाली के समाजवादी पार्टी में आने के बाद अब यह तय हो चुका है. शाह आलम गुड्डू जमाली एमएलसी बनाकर विधान परिषद में जाएंगे और अखिलेश यादव आजमगढ़ से चुनाव लड़ेंगे.

अखिलेश यादव के आजमगढ़ से इलेक्शन लड़ने के साथ ही यह बात भी तय हो रही है कि धर्मेंद्र यादव कन्नौज लोकसभा सीट से इलेक्शन लड़ेंगे. गुड्डू जमाली की ज्वाइनिंग के दौरान अखिलेश यादव ने इस बात को स्वीकार किया कि जमाली एमएलसी बन रहे हैं और वह लोकसभा का चुनाव आजमगढ़ से लड़ेंगे.

समाजवादी पार्टी कार्यालय में हुई प्रेस वार्ता के दौरान जब इस बाबत सवाल अखिलेश यादव से पूछा गया तो उन्होंने सकारात्मक जवाब दिया. सवाल था कि क्या गुड्डू जमाली एमएलसी बनकर विधान परिषद जा रहे हैं और आप आजमगढ़ से लोकसभा चुनाव लड़ेंगे.

इसके जवाब में अखिलेश यादव ने कहा कि यह पुरानी खबर हो चुकी है. यह पूरी तरह से तय हैं. ऐसे में डिंपल यादव मैनपुरी, अखिलेश यादव आजमगढ़, शिवपाल सिंह यादव बदायूं और धर्मेंद्र यादव कन्नौज से इलेक्शन लड़ेंगे. जबकि अक्षय यादव फिरोजाबाद से चुनाव लड़ सकते हैं.

अखिलेश इस बार कोई भी रिस्क लेने के मूड में नहीं हैं. वो एक कहावत है न दूध का जला छांछ भी फूंक-फूंक कर पीता है. अखिलेश यादव भी ठीक वैसा ही कर रहे हैं. आजमगढ़ के उपचुनाव में जो हुआ उसे वे अब तक भूल नहीं पाए हैं. 2019 के आम चुनाव में यहां से जीते, लेकिन फिर तीन साल बाद हुए उपचुनाव में उनकी पार्टी हार गई. जबकि आजमगढ़ को समाजवादी पार्टी का सबसे सेफ सीट समझा जाता है. जिस वजह से पार्टी हारी. अब वही वजह ख़त्म करने की योजना है.

आज़मगढ़ उपचुनाव में समाजवादी पार्टी के धर्मेंद्र यादव 8 हजार वोटों से हार गए। बीजेपी के दिनेश लाल यादव निरहुआ को 3 लाख 12 हजार वोट मिले। धर्मेंद्र यादव को 3 लाख 4 हजार और बसपा के शाह आलम उर्फ गुड्डु जमाली को 2 लाख 66 हजार वोट मिले थे। गुड्डु जमाली की वजह से मुस्लिम वोट बंट गये। बीजेपी को फायदा मिला। जमाली पहले भी विधायक रह चुके हैं। वह एक बड़ा बिल्डर है। उनका काम दिल्ली से लेकर लखनऊ तक फैला हुआ है। चुनाव के बाद वह समाजवादी पार्टी में शामिल हो गये। लेकिन पार्टी ने उन्हें 2022 के विधानसभा चुनाव में टिकट नहीं दिया। इसलिए वह फिर से मायावती के साथ चले गये। वह एक बार फिर लोकसभा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे। अगर वे दोबारा चुनाव लड़ते तो मुस्लिम मतदाता बंट जाते।

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