Date: 30/05/2024, Time:

अटल जी के बाद किसी ने नहीं लड़ा तीन क्षेत्रों से चुनाव! दो जगह से चुनाव लड़ने वाले हार से क्यों डरते है, दूसरे नंबर पर रहे प्रतिनिधि को मिले मौका, अग्निवीर की भांति नेताओं को भी मिलना चाहिए एक एक अवसर

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1951 को लोक प्रतिनिधित्तव अधिनियम में संशोधन कर तय किया गया था कि एक उम्मीदवार अधिकतम दो सीटों पर चुनाव लड़ सकते है। उसके बावजूद एक खबर के अनुसार 1957 के आम चुनाव में माननीय अटल बिहारी वाजपेयी जी द्वारा जनसंघ के टिकट पर लखनऊ मथुरा और बलरामपुर से एक साथ 3 जगह से चुनाव कैसे लड़ा गया था यह तो वही जाने लेकिन वो बलरामपुर सीट से जीतने में ही सफल हुए थे। उसके बाद से सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव श्रीमति इंदिरा गांधी श्री राहुल गांधी श्री नरेन्द्र मोदी आदि बड़े नेता समय समय पर निरंतर दो स्थानों से चुनाव लड़ते रहे है।
2004 में भारत निर्वाचन आयोग द्वारा एक व्यक्ति एक सीट से चुनाव लड़ने का प्रस्ताव रखा गया था लेकिन उसके बावजूद दो सीटों से एक साथ चुनाव लड़ने का प्रचलन समाप्त नहीं हो पाया। आखिर हमारे बड़े नेता जो अपने आप को सर्वमान्य जनप्रतिनिधि बताते नहीं थकते वो दो स्थानों से चुनाव क्यों लड़ते है। तो जो तथ्य जनमानस के हिसाब से उभरकर सामने आते है वो यही है कि हार के डर से बिना ये सोचे समझे कि दो जगह से लड़ने से कितना धन और समय बर्वाद होगा आज भी कुछ नेता एक स्थान पर जोर अजमाईश करने को तैयार नहीं है। और आश्चर्य की बात तो यह है कि चुनावों में सुधार की बात करने और न करने वाले दोनों ही एक सीट पर चुनाव लड़ने के निर्वाचन आयोग के प्रस्ताव का खुलकर समर्थन नहीं कर रहे है। आखिर ऐसा क्यों है? ये किसी को बताने की आवश्यकता नहीं है। मगर अब समय आ गया है कि 1951 के सेक्शन 33 प्रत्याशियों को अधिकतम दो सीटों से चुनाव लड़ने की अनुमति को लोकत्रंत की जड़े मजबूत करने और हर पात्र व्यक्ति को लोकसभा और विधानसभाओं में बैठकर जनहित में अपनी सोच का उपयोग करने का मौका मिलना ही चाहिए। बताते चले कि एक व्यक्ति को दो जगह से चुनाव लड़ने के लिए हत्तोसाहित करने हेतु दोनों जगह से चुनाव जीतने पर विधानसभा सीट के लिए पांच लाख और लोकसभा सीट के लिए दस लाख रूपये जुर्माने का प्रस्ताव रखा गया था मगर अभी तक दो स्थानों से चुनाव जीतने वाले कितने लोगों पर जुर्माना लगा यह स्पष्ट नहीं है।
मेरा मानना है कि या तो निर्वाचन आयोग सख्ती से एक जगह से चुनाव लड़ने का प्रस्ताव लागू करे वर्ना दो जगह से चुनाव लड़ने वाला व्यक्ति जो एक सीट छोड़ता है उस पर दूसरे नंबर पर रहे प्रत्याशी को चाहे वह किसी भी दल का क्यों ना हो बिना लड़े सांसद घोषित कर दिया जाए। जिससे छोड़ी गई सीट पर दुबारा चुनाव कराने से जो आर्थिक बोझ आम आदमी पर पड़ता है और समय की बर्वादी होती है उसे रोका जा सके अब। यह अब समय की मांग बनती जा रही है और अगर जल्दी ही हमारे नेताओं ने इस पर निर्णय नहीं लिया तो जनता चुनावों के दौरान उनसे जबाव सवाल कर यह पूछने लग सकती है कि दो जगह से चुनाव क्यों लड़ रहे हो और दोनों जगह से जीते तो किस पर कायम रहोगें और जो व्यक्ति छोड़ी गई सीट पर चुनाव लड़ेगा उस पर जो व्यवस्थाओं पर सरकार का धन खर्च होगा और अधिकारी और कर्मचारी के समय की बर्वादी उसकी भरपाई कैसे होगी और कौन करेगा। मेरा तो यह भी मानना है कि जैसे अब सरकार ने ज्याद से ज्यादा नौजवानों को रोजगार देने के लिए अग्निवीर व्यवस्था अपनाई है उसी प्रकार राजनीतिक पार्टियां भी अपने नेताओं को चुनाव लड़ पांच साल सेवा करने का मौका देकर नये चेहरे को सामने लाये। इससे एक तो नौजवानों को मौका मिलेगा दूसरे नये सोच के हिसाब से कानून और विकास की योजनाऐं बनेगी। और पुराने सांसद उनका मार्गदर्शन करेंगे तो देश को सोने की चिड़िया बनने और इसके चौमुखी विकास को कोई नहीं रोक सकता।
आदरणीय अटल बिहारी वाजपेयी जी के अलावा किसी ने तीन जगह से चुनाव लड़ा हो ऐसी जानकारी तो उपलब्ध नहीं है मगर अब समय आ गया है कि दो जगह से चुनाव लड़ने की व्यवस्था भी पूर्व काल की बात हो जाए वो ही अच्छा है। क्योंकि एक जगह से ही लड़ने का मौका मिलने से हमारे नेताओं को भी पांच साल तक जनता के बीच रहने और उससे किये गये वायदों के हिसाब से काम करने की फिकर बनी रहेगी और आगे जो नया उम्मीदवार खड़ा करेंगे उसकी जीत का चांस भी और मजबूत हो जाएगा।
(प्रस्तुतिः अंकित बिश्नोई सोशल मीडिया एसोसिएशन एसएमए के राष्ट्रीय महामंत्री मजीठिया बोर्ड यूपी के पूर्व सदस्य)

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