नई दिल्ली, 12 फरवरी। बांग्लादेश में पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की पारंपरिक सीट गोपालगंज-3 पर मुकाबला काफी दिलचस्प हो गया है। यहां ठछच् के उम्मीदवार एसएम जिलानी को दो हिंदू उम्मीदवार कड़ी टक्कर दे रहे हैं। निर्दलीय उम्मीदवार गोविंद चंद्र प्रमाणिक और गणो फोरम के दुलाल चंद्र विश्वास को मजबूत दावेदार माना जा रहा है। गोपालगंज-3 सीट में टुंगीपाड़ा और कोटालिपाड़ा इलाके आते हैं। टुंगीपाड़ा में करीब 26 प्रतिशत और कोटालिपाड़ा में 47 प्रतिशत से ज्यादा हिंदू आबादी है। यह इलाका शेख मुजीबुर रहमान की जन्मस्थली है और लंबे समय से अवामी लीग का गढ़ माना जाता रहा है।
गोविंद चंद्र प्रमाणिक का कहना है कि उन्हें लोगों से अच्छा समर्थन मिल रहा है। वहीं एक 23 साल के युवक ने कहा कि अगर वोट नहीं दिया तो हमला या केस हो सकता है। उसने कहा कि वोट तो देंगे, लेकिन शायद इस बार ठछच् को वोट दें।
बीएनपी ने भी कई अल्पसंख्यक उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं। उसके 80 हिंदू उम्मीदवारों में से ढाका-1 सीट से गोयेश्वर चंद्र रॉय को मजबूत माना जा रहा है। मगुरा में निताई रॉय चौधरी के सामने कोई बड़ा प्रतिद्वंद्वी नहीं है।
बागेरहाट-1 सीट जो पहले अवामी लीग का गढ़ रही है, वहां बीएनपी के कपिल कृष्ण मंडल मजबूत माने जा रहे हैं। बागेरहाट-4 में सोमनाथ डे भी जीत के दावेदार बताए जा रहे हैं।
जमात-ए-इस्लामी ने भी पहली बार किसी हिंदू उम्मीदवार को टिकट दिया है। पार्टी ने खुलना-1 सीट से कृष्णा नंदी को मैदान में उतारा है। यहां मुकाबला ठछच् के आमिर एजाज खान और सीपीबी के किशोर कुमार रॉय से है। कृष्णा नंदी अपने सरल और मजाकिया अंदाज के कारण सोशल मीडिया पर चर्चा में हैं।
गोपालगंज और खुलना के अलावा बागेरहाट, बरीसाल, पिरोजपुर, मगुरा, जेसोर और दिनाजपुर जिलों में भी हिंदू आबादी अच्छी खासी है। लेकिन बरीसाल, पिरोजपुर, जेसोर और दिनाजपुर में इस बार बड़ी पार्टियों ने हिंदू उम्मीदवार नहीं उतारे हैं।
बरीसाल-5 सीट से डेमोक्रेटिक यूनाइटेड फ्रंट की डॉ. मोनिषा चक्रवर्ती चर्चा में हैं। बरीसाल-2 से गणो अधिकार परिषद के रंजीत कुमार बरोई चुनाव लड़ रहे हैं, लेकिन उनकी जीत की संभावना कम मानी जा रही है। पिरोजपुर में कोई अल्पसंख्यक उम्मीदवार मैदान में नहीं है। जेसोर-4 से बीएमजेपी के सुकृति कुमार मंडल चुनाव लड़ रहे हैं। दिनाजपुर-3 से सीपीबी के अमृत कुमार रॉय और दिनाजपुर-1 से जकर पार्टी के रघुनाथ चंद्र रॉय मैदान में हैं, लेकिन उनकी जीत की उम्मीद बहुत कम बताई जा रही है।
बांग्लादेश का आम चुनाव तय करेगा कि देश आगे भारत के करीब रहेगा या पाकिस्तान और चीन की तरफ झुकेगा। इससे साउथ एशिया का पावर बैलेंस बदल सकता है। इसी वजह से इस चुनाव को बेहद अहम माना जा रहा है।
बांग्लादेश साउथ एशिया के पावर बैलेंस के लिए इसलिए अहम है क्योंकि यह देश भूगोल, राजनीति, अर्थव्यवस्था और रणनीतिक हितों चारों मोर्चों पर एक साथ असर डालता है। बांग्लादेश, भारत के पूर्वाेत्तर राज्यों को लगभग चारों तरफ से घेरता है। भारत का नॉर्थ-ईस्ट सिलीगुड़ी कॉरिडोर के जरिए भारत से कनेक्ट होता है। ऐसे में बांग्लादेश की भूमिका भारत के लिए कनेक्टिविटी, सुरक्षा और सप्लाई लाइनों के लिहाज से बेहद संवेदनशील हो जाती है।
दूसरी बड़ी वजह है भारत-चीन की रणनीतिक खींचतान। चीन पिछले कुछ सालों में बांग्लादेश में बंदरगाह, सड़क, बिजली और इन्फ्रास्ट्रक्चर में भारी निवेश कर चुका है। बांग्लादेश अगर चीन के ज्यादा करीब जाता है तो यह भारत के लिए सीधा रणनीतिक झटका होता है, खासकर बंगाल की खाड़ी और इंडियन ओशन रीजन में।
बांग्लादेश की समुद्री सीमा इस इलाके को रणनीतिक रूप से बहुत अहम बना देती है। यह इलाका ग्लोबल शिपिंग, एनर्जी रूट्स और नौसैनिक गतिविधियों के लिए बेहद संवेदनशील है। चौथा फैक्टर है इस्लामिक राजनीति और कट्टरपंथ। बांग्लादेश मुस्लिम बहुल देश है, लेकिन अब तक उसकी राजनीति तुलनात्मक रूप से संतुलित रही है। अगर वहां राजनीतिक अस्थिरता बढ़ती है या कट्टरपंथ को जगह मिलती है, तो इसका असर सिर्फ बांग्लादेश तक सीमित नहीं रहता, बल्कि भारत, म्यांमार और पूरे साउथ एशिया की सुरक्षा पर पड़ता है।
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