आजकल क्या हमेशा ही कम या ज्यादा मिलावटखोरी को लेकर सवाल उठते रहे है। छापे भी पड़ते है लेकिन कोई प्रभावी कार्रवाई परमानेंट न होने से मिलावट की व्यवस्था ज्यादातर चीजों में होने की खबरें खूब मिलती है। कहीं कहीं तो ऐसा पता चलता है कि बिलकुल विपरीत चीजें मिलाने से भी बेचने वाले नहीं हिचकिचा रहे है। क्योंकि अब जैसा देखने को मिलता है कि इस मुद्दे को लेकर कोई खबर छप जाए या कुछ लोग ज्ञापन देने पहुंच जाए मगर आम आदमी इसके विरोध में ना पहले कभी खड़ा हुआ और ना आज होने को तैयार है। जिससे ऐसा लगता है कि अब वो इस मिलावटखोरी का अभयस्त हो गया है या उसे महसूस होता है कि कुछ होने वाला तो है नहीं मैं ही क्यों समय बर्वाद करूं। सोचा जाए तो इसमे कोई गलत भी नहीं है। हमारे खाद्य विभाग के अफसरों की उदासीनता के चलते ज्यादातर त्यौहारों पर ही इस संदर्भ में कार्रवाई होती नजर आती है। और वर्षों से ऐसा ही होता चला आ रहा हैं। अब तो हाल यह है कि दूध में मिलावट पानी में मिलावट खाने पीने की चीजों में मिलावट इंजेक्शन लगे फल सब्जी बिकने की चर्चा भी खूब सुनने को मिलती है। जबकि हम मिलकर जागरूक हो तो इस कुरीति और मिलावटखोरी पर रोक लग सकती है।
मेरा तो मानना है कि जब ज्यादातर चीजों में मिलावट हो रही है हमें भी पता है फिर भी हम चुप है तो क्यों ना एक दूसरे की राय न मानकर छोटी छोटी बातों पर होने वाले बड़े बड़े हंगामों एवं घरेलू कलेश ना हो अच्छा यह है कि मिलावटखोरों की तरह भले ही हम मन से माने या ना माने अपना व समाज हित का ध्यान रखें मगर कोशिश करे कि विवाद कराने की बजाए बातों में बात मिलाने को प्राथमिकता दें क्योंकि इससे कई तरह के विवाद व झगड़े आसानी से मिट सकते है। करें आप अपने मन की मगर बातों की मिलावट में अगर समझदारी से काम लें तो जीवन में बल्ले ही बल्ले है।
(प्रस्तुतिः- अंकित बिश्नोई पत्रकार)
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