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    Home»देश»बीजापुर का श्री सीताराम मंदिर
    देश

    बीजापुर का श्री सीताराम मंदिर

    adminBy adminMay 16, 2026No Comments2 Views
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    बीजापुर, 16 मई (ता)। हमारे देश के सनातनी शासक मंदिर निर्माण को अपना सर्वाेच्च कर्त्तव्य मानते थे, जो आध्यात्मिक, सामाजिक, राजनीतिक केंद्र के साथ वास्तुकला के प्रतीक भी थे। हिमाचल प्रदेश के राजाओं ने कलात्मक और अपार धार्मिक रुचि के कारण अनेक भव्य मंदिरों का निर्माण करवाया है। शिलालेखों से पता चलता है कि कांगड़ा के राजा जयचंद (प्रथम) ने जयसिंहपुर नगर की स्थापना की थी। कांगड़ा के राजाओं ने मसरूर रॉक कट मंदिर, माता बज्रेश्वरी देवी मंदिर, माता ज्वाला जी मंदिर, सुजानपुर टीरा इत्यादि अनेको मंदिरों के निर्माण एवं संरक्षण और विस्तार में अपनी अहम भूमिका निभाई है। जयसिंह क्षेत्र के अंतर्गत बीजापुर गांव को कांगड़ा के राजा विजय चंद ने 1660 ईस्वी में बसाया था और उन्होंने 1690 ईस्वी में सीता राम मंदिर का निर्माण पूरा करवाया था। राजा विजय चंद की सिंहासन पर बैठते ही प्रबल इच्छा हुई कि एक ऐसे मंदिर का निर्माण किया जाए, जहां भगवान राम का जीवंत रूप में निवास करने का एहसास हो पाए। लेकिन उन्हें ऐसा कोई आध्यात्मिक सलाहकार नहीं मिला, जो उनके इस सपने को साकार करा पाए। राजा हर रोज जब भी सुबह-शाम पूजा करने लगते, तो हमेशा अपनी इच्छा को पूरा करने के लिए भगवान राम जी से प्रार्थना करते रहते थे। एक रात में उन्हें स्वप्र हुआ कि भगवान राम, सीता और लक्ष्मण की छवि जहां पहले से ही अंकित एक पवित्र शिला है, जो हारसी पत्तन के काठला वेई के पास ब्यास नदी में है। राजा ने उस शिला की खोज करवाकर मूर्तिकारों से तराशकर सुंदर मुर्तियां बनवाई। लेकिन जब राजा के भेजे हुए सैनिक मूर्तियां को उठाने की कोशिश करने लगे, तो काफी कोशिश करने के बावजूद मूर्तियां नहीं उठाई गई। उसके बाद राजा खुद सुबह पूजा करने के बाद नंगे पैर वहां गए और मूर्तियों के आगे नतमस्तक हो कर प्रार्थना करने के बाद उठाने की कोशिश की, तो उन्हें मूर्तियां बहुत ही हल्की लगीं।
    राजा भगवान की पवित्र मूर्तियां अपने कंधों पर उठाकर भव्य जुलूस के साथ मंदिर तक लेकर आए। मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा समारोह के बाद राजा को संदेह हुआ कि क्या सच में मूर्तियों में प्राण आ चुके होंगे? अगले दिन राजा पुनः मूर्तियों के आगे बैठ कर भगवान से प्रार्थना करने लगे कि कैसे उन्हें विश्वास हो कि मूर्तियों में सच में भगवान राम निवास कर चुके हैं। राजा ने अपने कांपते हुए हाथों से जब भगवान राम के सीने में स्पर्श किया तो उन्हें आभास हुआ कि भगवान श्री राम की प्रतिमा ने दो बार सांस लिया है। राजा को अभी सुनिश्चित हो चुका कि हमारी प्राण प्रतिष्ठा सफल हो गई है। कहा जाता है कि एक बार मुगल आक्रांताओं ने मंदिर को तोडऩे और लुटने के लिए आक्रमण किया था। आक्रांताओं ने आते ही पहले प्रभु हनुमानजी की बाजुओं पर वार किया। उसी समय अनगिनत मधुमक्खियां मूर्ति से निकल कर मुगल सैनिकों को काटने लगीं और उनका सफाया कर दिया था। कहा जाता है कि स्वयं हनुमान जी इस मंदिर की रक्षा के लिए आए थे। किंवदंतियों के अनुसार मान्यता है जो बच्चे ज्यादातर बीमार या किसी दुःख तकलीफ में रहते हैं, तो उनके अच्छे स्वास्थ्य और कल्याण के लिए मां सीता के चरणों में रखते है। ग्रामीणों के अनुसार राजा ने गांव में बहुत सी खेती बाड़ी की उपजाऊ जमीन मंदिर के नाम में दी थी। खेती से जो भी अनाज पैदा होता था उसका आधा मंदिर के लिए और आधा खेती करने वाले किसानों को मिलता था। लेकिन हिमाचल में काश्तकारी अधिनियम लागू होने के बाद मंदिर की सारी जमीन किसानों (काश्तकारों) के हाथों में चली गई। इससे मंदिर की व्यवस्था में बहुत फर्क पड़ा। इसलिए इस मंदिर के रखरखाव और प्रबंधन के लिए जम्मू-कश्मीर के राज परिवार द्वारा स्थापित धर्मार्थ ट्रस्ट मदद के लिए आगे आया, जो आज भी मंदिर की मदद कर रहा है। कहते हैं जम्म-कश्मीर के पूर्व महाराजा हरि सिंह का विवाह जयसिंहपुर की बेटी तारा रानी से हुआ था। इस प्राचीन मंदिर के सौंदर्यकरण व्यवस्था के लिए सरकार को लोगों की आस्था को ध्यान में रखते हुए आगे आना चाहिए।

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