नई दिल्ली 15 मई। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को चुनाव आयुक्त (सीईसी) और चुनाव आयुक्तों (ईसी) की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर केंद्र सरकार से सवाल किया। कोर्ट ने कहा कि अगर सरकार को ही फैसला करना है तो सिलेक्शन कमेटी में नेता विपक्ष को रखकर स्वतंत्रता का दिखावा करने की जरूरत क्या है।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने कहा कि सीबीआई डायरेक्टर की सिलेक्शन कमेटी में भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) शामिल होते हैं, लेकिन चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति वाली समिति में कोई स्वतंत्र सदस्य नहीं रखा गया है। कोर्ट मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। इस कानून के मुताबिक, सीईसी और ईसी की नियुक्ति के लिए प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और एक केंद्रीय मंत्री वाली समिति करेगी। पहले सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम व्यवस्था में इसमें भारत के सीजेआई को भी शामिल किया था।
याचिकाओं में कहा गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़ा 2023 का कानून चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को कमजोर करता है। इसमें चयन समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) को हटा दिया गया है। दरअसल, 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने हा अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ मामले में कहा था कि जब तक संसद नया कानून नहीं बनाती, तब तक चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और सीजेआई की समिति करेगी। बाद में केंद्र सरकार नया कानून लेकर आई, जिसमें उखकको समिति से बाहर कर दिया गया। इसी कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।
कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी से पूछ कि अगर प्रधानमंत्री एक नाम चुनते हैं और विपक्ष का नेता दूसरा नाम चुनता है, और दोनों में मतभेद होता है, तो क्या तीसरा सदस्य विपक्ष के नेता के पक्ष में जाएगा? इस पर अटॉर्नी जनरल ने माना कि शायद ऐसा नहीं होगा। इस पर कोर्ट ने कहा कि तो फिर सब कुछकार्यपालिका ही कंट्रोल कर रही है। ऐसे में विपक्ष के नेता को शामिल ही क्यों करते हैं? वे सिर्फ दिखावटी हो जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 6 मई को मामले की सुनवाई के दौरान पूछा था कि क्या अदालत संसद को नया कानून बनाने का निर्देश दे सकती है।
बेंच ने कहा कि एक याचिका में संसद को कानून बनाने का निर्देश देने की मांग की गई है। लेकिन क्या अदालत ऐसा निर्देश दे सकती है और क्या यह याचिका सुनवाई योग्य है क्योंकि कानून बनाना संसद का विशेषाधिकार है। वहीं राहुल गांधी ने 12 मई को पीएम आवास पर हुई मीटिंग में नए सीईसी डायरेक्टर के सेलेक्शन पर अपनी असहमति जताई थी। राहुल ने आरोप लगाया कि चयन के लिए जिन 69 उम्मीदवारों की लिस्ट दी है। उन्हें उनकी डिटेल उपलब्ध नहीं कराई। उन्होंने बैठक के बाद कहा कि सरकार ने चयन प्रक्रिया को केवल एक औपचारिकता बना दिया है। किसी पहले से तय व्यक्ति का चयन होता है।
कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हर फैसले में 2:1 के बहुमत से कार्यपालिका का पक्ष ही हमेशा भारी रहेगा। फिर नेता विपक्ष के कमेटी में रहने का औचित्य क्या है। क्या कोई कैबिनेट मंत्री प्रधानमंत्री के खिलाफ जाएगा?

