बीमारियों को लेकर अलग-अलग बयानों से जनता को डराना सही नहीं

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व्यापारी स्कूल संचालक प्रकाशक और आम आदमी आजकल बीमारियों को लेकर छप रही खबरों से काफी डरे हुए और परेशान नजर आ रहे हैं। केंद्र और प्रदेश की सरकारों द्वारा कोरोना महामारी की पहली लहर को छोड़ दे तो दूसरी लहर के दौरान ही टीके और दवाई इजाद कर पीड़ितों को काफी राहत पहुंचाई गई। और जिन्होंने दो टीके लगवा लिए उन्हें अब इससे कोई बड़ी समस्या ज्यादा तादात में होती नजर नहीं आ रही है। परिणामस्वरूप धीरे धीरे शिक्षण संस्थाएं खुली और उ़द्योग धंधे व्यापार शुरू हुए तथा शादी समारोहों में बाराती ठुमके लगाते नजर आने लगे मगर आए दिन मीडिया में कभी डेंगू, तो कभी ओमिक्रान वैरिएंट तो कभी कोरोना की तीसरी लहर आने और गंभीर परिणाम होने की पढ़ने को मिलने वाली सूचनाएं नागरिकों को डराने का काम कर रही है।
मजे की बात यह है कि एक जगह पढ़ने को मिलता है कि ओमिक्रान वैरिएंट के खतरनाक परिणाम हो सकते हैं तो कहीं पढ़ने को मिलता है कि इसका बड़ा असर होने वाला नहीं है। कहने का मतलब यही है कि बीमारी छोटी हो या बड़ी एक तो नागरिक उससे पहले ही डरे रहते हैं अब उसको लेकर अलग अलग खबरें छपना भय और आतंक का माहौल बने रहने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
और अगर देखें तो धीरे धीरे आम आदमी अभी इन बीमारियों से निपटने और इनसे होने वाले कष्टों को झेलने का आदि सा होता जा रहा है। क्योंकि उसे पता है कि ज्यादा से ज्यादा क्या हो सकता है। इसलिए हर परिस्थिति में अपने आप को बचाए रखने के माध्यम भी काफी लोग खोज चुके हैं।
लेकिन ग्रामीण कहावत शेर से ज्यादा टपके का डर की भांति कुछ मीडिया और चिकित्सकों द्वारा कारण कुछ भी हो जो आए दिन बिना किसी आधिकारिक तथ्य के जो बयानबाजी और घोषणाएं की जा रही है उनसे जो परेशान हैं वो भी और जो नहीं है वो भी डरे हुए हैं। मेरा आदरणीय प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी जी से आग्रह है कि वो संबंधित मंत्रालय और विभाग तथा डॉक्टरों को सलाह दें कि कोरोना से संबंध किसी भी बीमारी के बारे में अपनी राय व्यक्त करने से पूर्व चिकित्सक या इस काम में लगे लोग उस पर विचार कर लें और पूरा अध्ययन करने के बाद तथ्यपरक बयान दें। क्योंकि हो सकता है और होेने की संभावना है जैसे शब्द भय फैलाने का काम समाज में कर रहे हैं। और जहां तक नजर आ रहा है बीमारी से ज्यादा इस डर के कारण लोग नुकसान उठा रहे हैं और काम धंधे खुलकर नहीं कर पा रहे हैं। मेरा मानना है कि सरकार को भी चाहिए कि हर बात स्पष्ट और एक नीति निर्धारित कर की जाए। बच्चों को स्कूल जाकर पढ़ाई करनी है तो वो स्पष्ट करें और ऑनलाइन शिक्षा दी जानी है तो वो भी स्पष्ट होना चाहिए क्योंकि अब दोनों काम चल रहे हैं इससे कुछ नेता टाइप लोगों को सुर्खियों में रहने का मौका भले ही मिल जाए लेकिन आम आदमी इससे संतुष्ट नजर नहीं आता है। इसलिए जो भी हो वो स्पष्ट हो। और बीमारियों के बारे में पक्ष तथ्यपरक हो संभावनाओं पर नहीं। क्योंकि ऐसी व्यवस्था में डॉक्टर अपनी फीस बढ़ाते जा रहे हैं। दवाईयां महंगी मिलती जा रही है। कुछ दवाईयों का अभाव पैदा करने की कोशिश भी की जा सकती है। यह बात आम आदमी और राष्ट्रहित में नहीं कही जा सकती।

– रवि कुमार विश्नोई
सम्पादक – दैनिक केसर खुशबू टाईम्स
अध्यक्ष – ऑल इंडिया न्यूज पेपर्स एसोसिएशन
आईना, सोशल मीडिया एसोसिएशन (एसएमए)
MD – www.tazzakhabar.com

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