राजा हरिश्चंद्र नेता चाहिए तो हमें भी ईमानदार होना पड़ेगा

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पिछले कई दशक से हमेशा जहां चार आदमी इकटठा होते हैं और नेता व सरकार की बात चलती है तो एक शब्द लगभग हमेशा ही सुनने को मिलता है कि जो वादे जनता से किए थे नेता वो पूरे नहीं कर रहे। वैसे तो चुनाव में घर घर शीश नवाते हैं लेकिन जीतने के बाद पांच साल तक नजर नहीं आते और कभी दर्शन हो भी जाएं तो वो ज्यादातर बड़े जनप्रतिनिधियों के मंचों और उच्चस्तरीय नेताओं के जलसों या उपलब्धियां गिनाने के लिए होने वाली रैलियों के दौरान ही नजर आते हैं और यह भी आम आदमी को हमेशा ही शिकायत रहती है कि हमारे ज्यादातर नेता अब ईमानदार नहीं रहे वो कुछ अफसरों के भ्रष्टाचार रिश्वतखोरी और लापरवाही पर अंकुश नहीं लगा पाते हैं। चुनाव से पहले नेताजी पांच छह लाख की या पुरानी कार में घूमते थे और अब 15-20 लाख की गाड़ी में आ गए हैं। संपत्ति भी बढ़ी और कई तो यह भी कहने से नहीं चूकते कि दूसरे जिलों या प्रदेशों में हमारे नेताओं ने जमीन जायदाद बना ली है या अपने अलावा कुछ अन्य नामों से धन संग्रह भी किया गया है।
मैं यह तो नहीं कहता कि यह कथन और चर्चा सही है या गलत क्योंकि इसका कोई सही मापदंड जब तक सबूतों के साथ पेश ना करे सही नहीं कह सहते हैं लेकिन एक बात जरूर कही जा सकती है कि सरकार और नेता बनाने और अपने वोटों से विधायक और एमपी चुनने में सक्षम मतदाता इतने असहाय भी नहीं है कि जो उन्हें गलत दिखाई दे रहा है वो सही ना कर सकें। अब सवाल उठता है कि जब जनता सक्षम है तो फिर निरीह प्राणी के भांति उसके द्वारा सिर्फ बातें ही क्यों की जा रही हैं कुछ निर्णय क्यों नहीं लिए जाते तो जितना समझ में आता है उसके अनुसार हमारे यहां ज्यादातर लोग यह तो चाहते हैं कि सबकुछ हो जाए लेकिन हमें कुछ ना करना पड़े। भगत सिंह और राजा हरिश्चंद्र पड़ोसी बनें हम नहीं लेकिन ऐसा कहते समय सभी यह भूल जाते हैं कि जिसके सामने समस्या है या परेशानी उसे खुद ही आगे बढ़कर कुछ करना होगा। ग्रामीण कहावत जिसके पैर व पड़े विबाई वो क्या जाने पीर पराई यहां बिल्कुल सही उतरती है।
दोस्तों आजादी के बाद कांग्रेस जनसंघ का आधुनिक रूप भाजपा क्षेत्रीय दलों सपा, रालोद और दक्षिण भारत में सक्रिय राजनीतिक पार्टियों सहित आप और हम सबकी कार्यप्रणाली और वादे क्या होते हैं और क्यों किए जाते हैं यह अच्छी तरह समझ चुके हैं। क्योंकि बार बार ठोकर खाने से समस्या का समाधान नहीं होने वाला है। सुबह का भूला शाम को घर आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते उसी प्रकार से अगर हमें अपने नेताओं, सांसदों विधायकों व जनप्रतिनिधियों से कोई शिकायत है या उनके काम से हम संतुष्ट नहीं है तो अब समय है हमें अपने वोट के दम पर अपने सपने और सोच पर खरे उतरने वाले नेताओं के कंधें से कंधा मिलाकर चलने के लिए तैयार होना पड़ेगा।
पाठकों, 2022 में यूपी सहित कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। और इनमें बनी सरकारें हमारी समस्याओं के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के साथ साथ हमें हर तरह की सुविधा उपलब्ध कराने के अतिरिक्त हमारें सपनों को साकार करने का काम कर सकती हैं। इस बात को ध्यान में रखते हुए अपने मत की ताकत को पहचानकर आओ अभी से ऐसी मजबूत तैयारियां करें जिससे समय आने पर हम अपनी इच्छा और कामनाओं पर खरे उतरने में सक्षम उन जनप्रतिनिधियों को चुनकर भेजें जो हमारी भावनाओं पर खरें उतरते हों। एक बात इस संदर्भ में हमें समझनी और समझानी होगी कि अगर हम चाहते हैं कि हमारे चुने हुए जनप्रतिनिधि ईमानदार हो और भविष्य में वो हमारी परेशानियों का हल ढूंढने में कामयाब रहे तो चुनाव के दौरान चाहे झंडे बैनर हो या पोस्टर अथवा विभिन्न दावतों व अन्य फालतू खर्च हमारे उम्मीदवार द्वारा किया जाता है उन्हें रोकना होगा क्योंकि उम्मीदवार चाहे किसी भी दल का हो अगर घर से पैदा लगाएगा तो चुनाव जीतकर उसकी भरपाई तो उसे करनी ही पड़ेगी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता इसलिए ईमानदार राजा हरिश्चंद्र जैसा नेता चाहिए तो हमें खुद भी ईमानदार बनने पड़ेगा। आओ इस संकल्प के साथ संकल्प कर सपनों की सरकार बनाने के लिए अच्छे लोगों को चुनकर भेंजने के लिए माहौल तैयार करें और वोट जाति धर्म या किसी नेता और पार्टी के नाम पर ना देकर अपने मन की आवाज सुनकर वोट देने का माहौल बनाएं किसी के कहने से मतदान ना करें और ना होने दें।

– रवि कुमार विश्नोई
सम्पादक – दैनिक केसर खुशबू टाईम्स
अध्यक्ष – ऑल इंडिया न्यूज पेपर्स एसोसिएशन
आईना, सोशल मीडिया एसोसिएशन (एसएमए)
MD – www.tazzakhabar.com

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