मेनका और वरूण सरकार और कार्यकारिणी से बाहर, क्या गांधी परिवार एक होगा

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राजनीतिक दल कोई भी हो उसके मुखिया को यह तय करने का पूर्ण अधिकार होता है कि वो अगर सरकार में है तो किसे किस पद पर बैठाये और सत्ताविहिन है तो अपने दल में किसको किस पद पर स्थान दे। भले ही कोई इसका विरोध करे लेकिन इस अधिकार को चैलेंज आसानी से नहीं किया जा सकता। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नडडा द्वारा राष्ट्रीय कार्यकारिणी का गठन किया गया इसमें काफी समय से उपेक्षित यूपी भाजपा के पूर्व अध्यक्ष डॉ लक्ष्मीकांत जैसे वरिष्ठ नेताओं को स्थान देकर उनका मनोबल बढ़ाया गया तो पिछले कई साल से इसकी कार्यसमिति की सदस्य मेनका गांधी और उनके सांसद पुत्र वरूण गांधी को कोई स्थान नहीं दिया गया। बताते चलें कि पीएम मोदी के नेतृत्व में 2014 में केंद्र में बनी सरकार में मेनका गांधी को मंत्री पद मिला था लेकिन 2019 में बनी सरकार के मंत्रिमंडल में उनका नाम नदारद रहा। तब यह सोचा गया था कि शायद विस्तार में मेनका गांधी और उनके सांसद पुत्र वरूण गांधी को महिमामंडित किया जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। और अब कार्यकारिणी से मां बेटे को बाहर रखे जाना चर्चा बन रहा है।
बताते चलें कि वरूण गांधी एक मुखर वक्ता और स्पष्टवादी युवा नेता के रूप में अपने पिता संजय गांधी के समान अपनी अलग पहचान रखते हैं। केंद्र में भाजपा सरकार बनने पर जब उन्हें बाहर रखा गया तो यह सोचा गया था कि कहीं उनका कद और ज्यादा ना बढ़ जाए इसलिए उन्हें सरकार से दूर रखा गया है लेकिन जीव जंतुओं की रक्षा के लिए अभियान चलाने के लिए उनकी अपनी अलग पहचान है इसलिए जब उनका नाम दूसरे मंत्रिमंडल में नजर नहीं आया तो कई प्रकार की चर्चाएं चली थी और अब 80 सदस्यीय कार्यकारिणी से उन्हें बाहर किया जाना ताज्जुब का विषय बना हुआ है। वरूण गांधी किसान हितों को लेकर आवाज उठाते रहे हैं। इसलिए हो सकता है कि वो कार्यकारिणी से बाहर हुए हो लेकिन मेनका गांधी कभी सरकार की किसी नीति के खिलाफ बोली हों ऐसा याद नहीं आता। फिर भी दोनों मां बेटों को संगठन और सरकार से दूर रखे जाने पर सांसद मेनका गांधी का कहना है कि कार्यकारिणी में बदलाव करना पार्टी का हक है। यह कोई बड़ी बात नहीं।
कल क्या होगा यह तो समय ही बताएगा मगर फिलहाल राजनीतिक क्षेत्रों में एक बात सुनने को मिल रही है कि कहीं ऐसा तो नहीं है कि भाजपा गांधी परिवार विहीन और कांग्रेस गांधी परिवार को एकजुट करने में लगी हो। अगर इस बात में दम है तो इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव में मेनका गांधी और वरूण गांधी भाजपा के चुनाव अभियान से दूर रह सकते हैं और 2024 के लोकसभा चुनाव में अगर यही स्थिति बनी रही तो अपनी अवहेलना से मजबूर होकर कांग्रेस के स्टार प्रचारकों के चेहरों में शामिल नजर आ सकते हैं। होगा क्या यह तो समय ही बताएगा।

– रवि कुमार विश्नोई
सम्पादक – दैनिक केसर खुशबू टाईम्स
अध्यक्ष – ऑल इंडिया न्यूज पेपर्स एसोसिएशन
आईना, सोशल मीडिया एसोसिएशन (एसएमए)
MD – www.tazzakhabar.com

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