प्रधानमंत्री जी ध्यान दीजिए! आपूर्ति बनाए रखने हेतु रोकी जाए बर्बादी, बिजली और कोयले के संकट से जनता को कराए अवगत

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खपत के मुकाबले बिजली उत्पादन में कमी का मुददा हमेशा ही गरमाता रहा है। परिणामस्वरूप अननियमित आपूर्ति और आक्समिक रूप से कटौती से लोग परेशान रहते हैं तो कई लापरवाही और चीज की कीमत ना समझने के कारण इसकी बर्बादी करने से भी नहीं चूकते हैं। कुल मिलाकर देखे तो खाली पड़े सरकारी कार्यालयों में जलती लाइटें, पंखें कूलर और एसी भी बिजली आपूर्ति की कमी का सबसे बड़ा कारण तो बनते ही हैं। आम उपभोक्ताओं को भी महंगी बिजली खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ता है जिससे उसके समक्ष आमदनी कम और खर्च ज्यादा के चलते आर्थिक कठिनाईयां उत्पन्न होने की बात से इनकार नहीं किया जा सकता। वर्तमान में देश के ज्यादातर हिस्सों में इसके संकट की चर्चा सुनाई दे रही है। हो रही कटौती से नागरिक परेशान है तो जरूरी काम प्रभावित हो रहे हैं। मगर अक्टूबर का महीना चल रहा है। अब धीरे धीरे गर्मी में कमी आएगी। उमस समाप्त होगी और एसी पंखे चलने बंद होने से कुछ सुधार होने की बात से तो इनकार नहीं किया जा सकता। मगर बढ़ती मांग के चलते जो संकट उत्पन्न हुआ है। उसको लेकर सब चिंतित है। केंद्रीय ऊर्जा मंत्री आरके सिंह कोयले की प्राप्त उपलब्धता का दावा करते हुए बिजली संकट ना होने की बात कर रहे हैं और साथ ही यह भी कह रहे हैं कि बिजली संयंत्रों के पास नियमानुसार 17 दिन का स्टाक होना चाहिए जो सिर्फ चार दिन का है। दूसरी तरफ ऊर्जा मंत्री के कथन के विपरित खबरों के अनुसार ऊर्जा मंत्रालय आपूर्ति में कमी और उत्पादन में गिरावट की बात मान रहा है।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ व दिल्ली, झारखंड आदि द्वारा प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर इस ओर उनका ध्यान दिलाया गया है। तो दूसरी ओर केरल में केंद्रीय पूल से कोयले की आपूर्ति कम हो रही बताई जाती है। भावी संकट को लेकर सब चिंतित है। दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया का कहना है कि जिस प्रकार सरकार ने कोरोना के दौरान ऑक्सीजन की तरफ से आंख मंूद ली थी वैसे ही केंद्र सरकार कोयले का संकट मानने को तैयार नहीं है। केंद्र सरकार की यह नीति देश के लिए घातक सिद्ध हो सकती है।
ऐसे समय में भी उत्तर प्रदेश में विद्युत अभियंताओं द्वारा दो घंटे का कार्य बहिष्कार किया जाना और तकनीशियनों का सांकेतिक धरना प्रदर्शन किसी भी रूप में सही नहीं कहा जा सकता लेकिन ताज्जूब की बात है कि विभाग द्वारा इनके खिलाफ कोई सख्त कदम ना उठाए जाने से अन्य परेशानियां भी खड़ी हो सकती है जनता के समक्ष। इस खबर की ओर से सरकार को आंख नहीं मूंदनी चाहिए कि मेरठ, सहारनपुर और मुरादाबाद मंडल के कुछ जिलों में बिजली की चाल बिगड़ने लगी है। और रोस्टिंग बढ़ गई बताई जाती है। अफसर भले ही कितने दावे कर रहे हों कि पश्चिमांचल पर अभी बिजली संकट का ज्यादा असर नहीं है लेकिन कठिनाई तो जनता के सामने आ रही है इसीलिए उन्हें ऐसा दावा करने में कोई कष्ट नहीं हो रहा है। बताते हैं कि कोयले की कमी के चलते जो संकट गहराता जा रहा है। उससे देश के 70 संयंत्रों में चार दिन से कम का कोयला उपलब्ध बता रहे हैं। कमी को पूरा करने के लिए केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह द्वारा इसकी कमान संभाली गई है। केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय व सचिव मौजूदा हालात से जुड़ी जानकारी पीएम के प्रधान सचिव के समक्ष पेश करेंगे। तो गत दिवस केंद्रीय गृह मंत्री ने ऊर्जा मंत्री के साथ विस्तार से चर्चा की। उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ ने निर्देश दिए हैं कि गांव व शहरों में शाम छह से सुबह सात बजे तक बिजली कटौती ना हो। यह एक अच्छी बात है। एक संकेत यह भी अच्छा है कि कोयले के उत्पादन में सुधार की चर्चाएं शुरू हो रही है लेकिन स्टाक का संकट तो बना हुआ ही है और जब तक यह दूर नहीं होता तब तक उपभोक्ता के समक्ष नियमित विद्युत आपूर्ति का संकट तो बना ही रहेगा।
मेरा मानना है कि सरकार को बिजली आपूर्ति में आ रही कमी और कोयले के संकट के संदर्भ में गफलत में रखने के बजाय सही स्थिति सबके सामने रखते हुए बिजली की बर्बादी रोकने के अतिरिक्त कम खपत करने का आग्रह करते हुए जो प्रतिष्ठान देर रात तक खुले रहते हैं उनको समय से बंद कराने का निर्णय भी आम आदमी के हित में लेना चाहिए। और इधर उधर से महंगी बिजली खरीदने के बजाय इसके उत्पादन में सुधार और बढ़ी दरों पर आपूर्ति करने वालों पर अंकुश लगाने की बड़ी आवश्यकता को समझकर भी निर्णय लेने हांेगे।

– रवि कुमार विश्नोई
सम्पादक – दैनिक केसर खुशबू टाईम्स
अध्यक्ष – ऑल इंडिया न्यूज पेपर्स एसोसिएशन
आईना, सोशल मीडिया एसोसिएशन (एसएमए)
MD – www.tazzakhabar.com

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