क्या यूपी चुनाव में विपक्षी दलों की महत्वकांक्षा भाजपा को सत्ता से बाहर कर पाएगी! तृणमूल कांगे्रस, शिवसेना, आप पार्टी, एआईएमआईएम भी स्थानीय दलों के अलावा चुनाव मैदान में उतरने को है तैयार

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एक फिल्मी गाना नजर लागी राजा तोहरे बंगले पर इस समय उत्तर प्रदेश पर भी कुछ सही उतरता नजर आ रहा है क्योंकि यह किसी से छिपा नहीं है कि केंद्र की सत्ता तक पहुंचने का रास्ता यूपी से होकर जाता है। वर्तमान में शायद इसीलिए 2022 के विधानसभा चुनावों को हलवा समझकर हर कोई खाने के प्रयास में चुनावी राजनीति व चुनाव लड़ने करने की बात करने लगा है। प्रदेश में सबसे बड़े दो राष्ट्रीय दल भाजपा और कांग्रेस तो अपना वर्चस्व कायम करने के लिए हर संभव प्रयास कर ही रहे हैं और इसको सफल बनाने हेतु दोनो दलों के नेता रात दिन एक किए हुए हैं। भाजपा को मोदी और योगी का सहारा है तो कांग्रेस को सोनिया राहुल प्रियंका चुनाव जीताउ नजर आ रहे हैं। लेकिन सबसे बड़ी टक्कर उन्हें यहां समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी देती दिखाई देती है। मतगणना के बाद विजयश्री किसे प्राप्त होगी यह तो समय बताएगा लेकिन उससे पहले मतदान की स्थिति आने तक किन दलों का यहां वर्चस्व है उनके नेताओं के साथ ही जिनकों शायद सभी विधानसभा क्षेत्रों में उम्मीदवार भी नहीं मिल पाएंगे वो भी ताल ठोंकने का दंभ भर रहे हैं।
देश की राजधानी दिल्ली में अपने बूते सरकार चला रहे अरविंद केजरीवाल की पार्टी आप के अलावा शिवसेना, और तृणमूल कांग्रेेस, असददुीन ओवैशी की पार्टी एआईएमआईएम चंद्रशेखर की आजाद समाज पार्टी जयंत चैधरी की रालोद व शिवपाल यादव की प्रसपा चुनावी समर में लंगड़ घुमाने के लिए तैयार हैं। कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि समान विचारधारा वाले छोटे दलों से मिलकर चुनाव लड़ेंगे लेकिन अभी तक कहीं से ऐसे संकेत नहीं मिल रहे हैं कि किनके साथ मिलकर कौन चुनाव लड़ेगा। मगर कोई धमक के साथ तो कोई प्यार से समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव से चुनावी सांठगांठ गठजोड़ बनाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहा हैं। ओर जहां तक नजर आता है प्रदेश के पूर्व मंत्री शिवपाल यादव की प्रसपा और जयंत चैधरी की रालोद से तो समझौता होना सपा का पक्का नजर आ रहा है। रही बात तृणमूल कांग्रेेस की तो जहां तक लगता है पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी यूपी के पूर्व सीएम अखिलेश यादव से हाथ मिलाने में पीछे नहीं रहेंगी। कोशिश बसपा नेताओं की भी होगी कि समान विचारधारा वाले छोटे दल उनके साथ मिलकर चुनाव लड़ें। लेकिन आप पार्टी अकेले भी लड़ सकती है और सपा या बसपा से मिलकर भी। लेकिन आजाद समाज पार्टी के नेता चंद्रशेखर आजाद और एआईएमआईएम के असददुदीन ओवैशी की राजनीतिक महत्वकांक्षा अगर आड़े आई तो शायद सपा और बसपा से इनका राजनीतिक गठजोड़ आसान नहीं होगा। अब अगर यह अकेले लड़ते हैं या दोनों मिलकर तो खुद चुनाव जीत पाए या ना जीत पाए सपा बसपा और कांग्रेस को कुछ सीटों पर भाजपा के हाथों हार का मुंह देखना पड़ सकता है लेकिन शिवसेना क्योंकि महाराष्ट्र में कांग्रेस से मिलकर सरकार चला रही है इसलिए यहां भी उसका तालमेल इन दोनों में हो सकता है क्योंकि सीटों को लेकर भी इनमें कोई बड़ी लड़ाई शायद नहीं होगी। मगर इस सबके बावजूद जो चुनावी पृष्ठभूमि भाजपा को हराने और सत्ता से बाहर करने के लिए विपक्षी दल अभी तक बनाने की कोशिश कर रहे हैं कहीं ऐसा ना हो कि ग्रामीण कहावत हमें भी खिलाओ नहीं तो खेल बिगाड़ेंगे की भांति जिन दलों का मुख्य विपक्षी दलों से सीटों को लेकर समझौता नही हो पाएगा वो दोबारा भाजपा को सत्ता में पहुंचाने और विपक्षी की हार का कारण ना बन जाए इस तथ्य को विपक्ष के सभी बड़े नेताओं को ध्यान में रखकर 2022 के विधानसभा चुनाव की योजना तैयार करनी होगी वरना फिल्मी गाने नजर लागी राजा तोहरे बंगले के शब्द विपक्ष के लिए सुनहरे हसीन ख्वाब ही बनकर रह जाएंगे। क्योंकि किसान आंदोलन बढ़ती महंगाई और अपराधों से कमजोर हो रही भाजपा आसानी से विपक्षी मतों के बिखराव का लाभ उठाकर दोबारा सत्ता संभालने में चूकेगी नहीं।

– रवि कुमार विश्नोई
सम्पादक – दैनिक केसर खुशबू टाईम्स
अध्यक्ष – ऑल इंडिया न्यूज पेपर्स एसोसिएशन
आईना, सोशल मीडिया एसोसिएशन (एसएमए)
MD – www.tazzakhabar.com

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