शादी समारोह व होटलों में शुद्धता के लिए हो यह उपाय

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बचपन से एक कहावत सुनने को मिलती है जैसा खाओगे अन्न, वैसा हो जाएगा मन। साफ खाओ और दूसरों को भी साफ सुथरा खिलाओ। क्योंकि इससे आदमी का मन प्रफुल्लित रहता है और वो सबके बारे मंे अच्छा सोचता है और शायद यही देश और समाज की प्रगति का मूल उददेश्य कहा जा सकता है। लेकिन आजकल जो सुनने को मिल रहा है कोई रोटी बनाने में शादी समारोह में थूक लगा रहा है तो कहीं दूषित बिरयानी खिलाने की बात सामने आ रही है। तो कहीं खाने पीने के सामान बनाने के माध्यमों पर जानवर घूमते हुए दिखाई देते हैं। एक फोटो छपा जिसमें कुत्ता डोसा बनाने वाला तवा चाटता नजर आ रहा है। यह देखकर मन दुखी होता है और कभी कभी ऐसी इच्छाएं बनती है कि बाहर का खाना बिल्कुल बंद कर दिया जाए लेकिन यह संभव नहीं दिखता है क्योंकि एक तो चटोरी जबान और कहीं बाहर का खाना खाने की इच्छा ऐसा नहीं करने देती दूसरी तरफ खानपान का व्यवसाय खरबों रूपये का है। अगर वो बंद होने की कगार पर आया तो अर्थव्यवस्था पूरी तौर पर बिगड़ सकती है। अब रही बात कि सबको साफ सुथरा खाने को मिले और बनाने व परोसने वाले भी स्वच्छता का ध्यान रखें, उतना आसान नहीं है लेकिन जितना दिखाई देता है उसके हिसाब से यही लगता है कि ना तो अब कुछ बातों को छोड़कर ना तो आदमी धर्मगुरूओं की मानता है और ना ही जनप्रतिनिधियों की। सवाल आखिर यह उठता है कि ऐसा चलने नहीं दिया जा सकता। तो फिर क्या किया जाए। विवाह मंडप वाले कह रहे हैं कि खाना बनाने वाली जगहों पर कैमरे लगाए गए हैं। लेकिन यह किसी को बताने की आवश्यकता नहीं है कि व्यवस्थाओं को छिपाने के लिए जब चाहे तब उनकी दिशा बदल दो या कनेक्शन बंद कर दो तो कहां क्या हो रहा है और क्या हुआ कुछ पता नहीं चलता और जरूरत के अनुसार फिर शुरू कर दो तो फिर कोई यह भी नहीं कहता कि कैमरे नहीं चल रहे थे।
मेरा मानना है कि हर जिले में साफ सुथरी और शुद्ध खाद्य सामग्री सब को हर जगह उपलब्ध कराने के लिए कर्मचारी और अधिकारी तैनात किए गए हैं। मगर उनकी संख्या इतनी नहीं है कि वो सब जगह दौड़ सके और खाना चेक कर सके। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए यह कहा जा सकता है कि अब सरकारों को चाहिए कि वो जिलाधिकारियों और पुलिस अधीक्षकों को निर्देश दे कि सब अपने क्षेत्र के गांव देहातों और गली मोहल्लों से साफ सुथरे रहने वाले सेवाभावी लोगों की टीमें बनाएं और उन्हें प्रशिक्षण दे कि वो किस किस तरीके से और कब कब अपने क्षेत्र के खाद्य सामग्री बेचने वालों, होटलों और समारोह आदि में बनने वाले खाने आदि की आकस्मिक रूप से जांच करें। तो मुझे लगता है कि थोड़ा बहुत यह जो गंदगी देखने या पढ़ने सुनने को मिलती है इसमें कमी आ सकती है और हमें अच्छा खाने को मिल सकता है। इसके लिए मेरे कुछ सुझाव है
1 होटलों और विवाह स्थलों तथा सड़कों पर खाने का सामान बेचने वालों की सप्ताह में एक दिन छापेमारी कर चैकिंग की जाए।
2 खाना बनाने वाले जो स्थान हैं उनके लिए कुछ नियम निर्धारित कर वहां सफाई और शुद्धता बनी रहे इसलिए नियमित रूप से उन जगहो की धुलाई आदि हो।
3 खाना बनाने और परोसने के बर्तनों की चैकिंग भी सप्ताह में एक बार हो।
4 कैमरा लगाए जाए और वह 24 घंटे सक्रिय रहे। खराब होने पर सही कराने की व्यवस्था हो।
5 शादी या अन्य कार्यक्रम होटलों में हो या विवाह मंडपों में खाना बनाने और परोसने वालों के नाखून कटे होने चाहिए। जो कपड़े वह पहनते हैं वह धुले हो और यह निर्देश हो कि इस काम में आने वाले लोेग बिना नहाय काम पर ना आए।
6 जब खाना बन रहा हो तो कमेटियों को यह अधिकार हो कि वह किसी भी स्थान पर जाकर चैकिंग कर सके।
7 जो सामग्री सब्जी दाल आटा या घी हो उसको भी चैक किया जाए कि वह मिलावटी या खराब तो नहीं है। उसकी छनाई का काम हलवाई या मंडप संचालक व आयोजक के द्वारा किया जाए।
मैं समझता हूं कि अगर ऐसे कुछ इंतजाम स्थायी रूप से लागू और करा दिए जाएं और फिर उनकी माॅनटिरिंग होती रहे तो फिर यह कहा जा सकता है कि हम शुद्ध खाना खा रहे हैं। इसके बाद भी जिसके यहां आयोजन है उसकी जिम्मेदारी है कि जिस प्रकार आमंत्रितों का स्वागत करते हैं उसी प्रकार परिवार व मित्रों की डयूटी देखरेख के लिए लगाएं। क्योंकि शुद्धता बनाए रखने और कमियां होने पर होने वाले बवाल से बचने हेतु अब कुछ ना कुछ सबको मिलकर करना पड़ेगा वरना रोटियांें पर थूक लगाकर बनाने वाले को आप 14 साल की भी सजा दे दो तो ऐसी मंशा रखने वाले सभी सुधरने वाले नहीं है। शायद अब हमें एक प्रचलित कहावत सावधानी हटी दुर्घटना घटी को इस मामले में अपनाना होगा। और सबसे बडी बात तो यह है कि शादी विवाह में हम दिखावा करने के लिए बेहिसाब आइटम बनवाते हैं उन पर भी अब अंकुश लगना चाहिए। क्योंकि कम चीजें होंगी तो देखभाल ज्यादा हो सकती है। और ऐसी स्थिति में आदमी जो जाता है वो खाना भी भरपेट खाकर जाता है। ज्यादा चीजें देखकर भी कभी पेट भरा सा लगने लगता है।

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– रवि कुमार विश्नोई
सम्पादक – दैनिक केसर खुशबू टाईम्स
अध्यक्ष – ऑल इंडिया न्यूज पेपर्स एसोसिएशन
आईना, सोशल मीडिया एसोसिएशन (एसएमए)
MD – www.tazzakhabar.com

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