रूस का अमानवीय प्रयोग, जिसमें कैदियों की रिहाई के लिए रखी गई न सोने की शर्त

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नई दिल्ली 20 फरवरी। दुनिया के देश युद्ध की आशंका को देखते हुए लगातार कोई न कोई खुफिया प्रयोग करते रहे हैं. इन्हीं में से एक है रूस का स्लीप एक्सपेरिसमेंट. कथित तौर पर चालीस के दशक में रूस में हुए इस प्रयोग में कैदियों को सारी सुविधाएं दी गईं लेकिन सोने नहीं दिया गया. प्रयोग के नतीजे काफी खौफनाक रहे. यहां तक कि वैज्ञानिकों को प्रयोग अधूरा छोड़ना पड़ा. आज इतने दशकों बाद भी रूस के इस प्रयोग की बातें चलती हैं. जानिए, क्या था ये प्रयोग और क्या रहे नतीजे.

कैसे शुरू हुई प्रयोग की बात
ये बात दूसरे विश्व युद्ध के बाद की बताई जाती है. जब सोवियत संघ में जोसेफ स्टालिन काफी ताकतवर था. उसी के कहने पर सेना के वैज्ञानिक ने नींद पर प्रयोग करने की ठानी. इसके तहत रूस में बने लेबर कैंपों, जिन्हें गुलाग कहा जाता था, वहां से 5 कैदी चुने गए. ये कैदी पूरी तरह से स्वस्थ थे और काफी सेहतमंद थे. उनसे वादा किया गया कि अगर वे प्रयोग का हिस्सा बनेंगे तो 30 दिन बिना बिना शर्त उन्हें रिहा कर दिया जाएगा. डिटेंशन कैंपों में यातना सहते कैदी तुरंत तैयार हो गए.
प्रयोग के तहत कैदियों को लगातार 30 दिनों तक बिना नींद के रहना था. कैदी राजी थे ही. उन्हें तुरंत लैब में लाया गया और एक एयर टाइट चैंबर में छोड़कर वहां कथित तौर पर साइकोट्रॉपिक गैस भर दी गई ताकि उन्हें नींद न आ सके. इस बीच उन्हें खाना-पीना दिया जाता रहा.

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युद्ध-बंदियों का व्यवहार तेजी से बदला
प्रयोग के पांच ही दिनों के भीतर तंदुरुस्त कैदी चीखने-चिल्लाने लगे. वे लगातार रोने लगे. इसके बाद एकाएक उन्हें चुप रहने का दौरा पड़ गया. यहां तक कि वे आपस में भी बोलना बंद कर चुके थे. ग्यारहवां दिन आते-आते एक कैदी इतनी जोर से चीखने लगा कि उसकी गले की नसें फट गईं. लेकिन हैरानी की बात ये थी कि उसके रोने-चीखने का कुछ भी असर साथी कैदियों पर नहीं दिख रहा था. वे एकदम चुप बैठे शून्य में देखते रहते थे.

बिगड़ने लगे हालात
माना जाता है कि इस बीच एक कैदी की मौत हो गई. हालत बिगड़ती देख वैज्ञानिकों ने 15वें दिन ही प्रयोग रोकने का फैसला लिया. वे चैंबर में पहुंचे तो वहां की हालत देखकर चौंक गए. दिनों से जाग रहे कैदी अपने ही शरीर का मांस नोंचने लगे थे. कई लोगों के हाथ-पैर गायब हो चुके थे और सिर्फ हड्डियां बाकी थीं. बाद में एक वैज्ञानिक ने ही बाकी कैदियों को मार दिया और इसके बाद प्रयोग से जुड़े सारे तथ्य गायब कर दिए गए.

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मनगढ़ंत भी कह जाता है
हालांकि रूसी स्लीप एक्सपेरिमेंट के बारे में ये भी कहा जाता है कि ये मनगढ़ंत बात है जो एक वेबसाइट ने डाली थी. इसके लिए ये तर्क भी दिया गया कि अब तक ऐसी कोई गैस नहीं बनी है जो लोगों को नैचुरल नींद आने पर रोक सके. तब भी काफी लोग इस प्रयोग को सच्चा मानते हैं. इसकी वजह ये है कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद वास्तव में कई देशों ने हारे हुए देश के सैनिकों और लोगों के साथ अमानवीय व्यवहार किया था और बहुतेरे प्रयोग भी किए थे.

जापान ने भी किये थे वीभत्स प्रयोग
इन्हीं में से थी जापान की यूनिट 731 लैब. साल 1930 से 1945 के दौरान Imperial Japanese Army के सैनिकों ने चीन के पिंगफांग जिले में ये प्रयोगशाला बना रखी थी. चीन का इससे कोई लेनादेना नहीं था, सिवाय इसके कि लैब में किए जाने वाले प्रयोग चीन के लोगों पर होते थे. दशकों बाद इस लैब में होने वाले प्रयोगों के आधे-अधूरे दस्तावेज सामने आए, जिन्होंने दुनिया का दिल दहला दिया. इन कागजों में 1000 से भी ज्यादा जापानी डॉक्टरों, नर्सों, सर्जन्स और इंजीनियरों का जिक्र था जिन्होंने चीन के लोगों को अपने खतरनाक और जानलेवा प्रयोगों का हिस्सा बनाया.

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कैदियों को करते थे ऐसे करते थे टॉर्चर
इसी यूनिट का एक हिस्सा था, जिसे Maruta के नाम से जानते हैं. इस शाखा का प्रयोग भयंकर यातना देने वाला था. इसके तहत ये देखने की कोशिश होती थी कि इंसान का शरीर कितना टॉर्चर झेल सकता है. चीनी सेना को बिना बेहोश किए धीरे-धीरे उनके शरीर का एक-एक अंग काटा जाता. इसमें सेना के बहुत से अधिकारियों की मौत हो गई, जिसके बाद आम चीनी जनता पर प्रयोग होने लगा. इस तरह से कई सारे वीभत्स प्रयोग होते थे लेकिन बाद में सारे रिकॉर्ड जला दिए गए.

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