हत्या, आत्महत्या और दुर्घटनाएं ! आखिर यह हो क्या रहा है, समाज और हमें सोचना होगा

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मानव जीवन वर्तमान हो या आदिकाल दुनिया के हर क्षेत्र में अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। बताते हैं कि सदियों तक अच्छे कार्य करने और सोच रखने के चलते मानव योनि में जन्म मिलता है। इसीलिए शायद बुद्धि ज्ञान और सोच के मामले में इस जीवन को श्रेष्ठ माना गया है। आधुनिक सुविधाओं का उपयोग भी जरूरी है। लेकिन मेरा मानना है कि जहां तक जीवन का मामला है। सब इसके सामने बौने हैं। इसलिए शायद उसे बचाने और लंबे समय तक उसका उपयेाग करने के लिए सरकार भी प्रयत्न करती है और अब तो मानव जीवन की अवधि लंबी करने और उसे स्वस्थ बनाने के लिए काफी आविष्कार और प्रयास भी शुरू हो गए हैं।
उसके बावजूद कोई कानों में ईयरफोन लगाकर घूमने के कारण मर रहा है तो कहीं आधुनिक सुविधाओं के उपयोग के लिए तो कुछ मामले में धन संपत्ति तो कई में अहम और अपनी बात उपर रखने के लिए या तो एक दूसरे की जान ली जा रही है या दुर्घटनाओं में चली जा रही है। पिछले कुछ वर्षों में हमारी सरकारों ने दुर्घटनाओं हत्याओं व आत्महत्याओं तथा रेप की घटनाओं को रोकने के लिए काफी उपाय किए। और कानून भी बनाए हैं। मगर फिर भी ज्यो ज्यो दवा की मर्ज बढ़ता ही गया। इस संदर्भ में खबरें पढ़ने सुनने को मिलने और आम आदमी को दुखी करने का काम कर रही हैं। बीते दिनों उड़ीसा के बालासोर जिले में 58 साल की एक महिला सुक्री गिरी को दो व्यक्तियों के माध्यम से अपनी बेटी की हत्या कराने के लिए पकड़ा गया। तो यूपी के बिजनौर के देहात स्योहारा के एक गांव चकमहदूद सानी में एक दामाद ने अपने सास ससुर की गला रेतकर हत्या कर दी तो उत्तराखंड के हल्द्वानी के घटनास्थल बरेली रोड के हैरा गजजर पोस्ट अर्जनपुर में दामाद ने अपने पिता के साथ मिलकर विकलांग ससुर की हत्या की एवं मेरठ के लिसाड़ी गेट निवास मोनू पुत्र हरफूल ईयरफोन लगाकर घूमते हुए ट्रेन से कटकर मर गया। क्षेत्रीय पुलिस अधिकारी एएसपी कृष्ण बिश्नोई द्वारा इस मामले को दुर्घटना बताया गया है। दूसरी ओर यूपी के जिला बांदा में 24 दिसंबर 2017 को अपने पांच माह के बेटे को नदी की चटटान पर पटककर मारने वाले पिता को उम्रकैद की सजा भले ही हो गई हो लेकिन ऐसी हत्या आत्महत्याएं या दुर्घटनाएं इनके पीछे कारण कुछ भी हो मगर मानव जीवन तो समाप्त हो ही रहा है और इस संदर्भ में बनाए गए कानून सख्त होने के बाद भी ऐसी घटनाएं रूक नहीं पा रही है। जिन्हें पढ़कर और सुनकर कभी कभी आत्मा तक विचलित हो जाती है और यह सोचना पड़ता है कि आखिर यह हो क्या रहा है। मेरा मानना है कि शायद सख्त कानून बनाने या जेल भेजने से जिस प्रकार से दुष्कर्म, छेड़छाड़ और रेप की घटनाएं नहीं रूक रही है हत्या आत्महत्या रूक पाना भी शायद संभव नहीं है।
इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए आवश्कता है हर व्यक्ति को जागरूक करने की जो आसानी से संभव नहीं है। क्योंकि किसी प्रकार के विज्ञापन छपवाकर या जुलूस निकालकर अथवा सभाएं कर इसका समाधान नहीं निकल सकता। मेरी निगाह में इसके लिए पांच साल के बच्चों के स्कूलों से लेकर काॅलेजों तक इस संदर्भ में जागरूकता अभियान चलाया जाए और गोष्ठियां आयोजित की जाएं व सिलेबसर में शामिल किया जाए जिससे विद्वानों द्वारा आसान तरीके से समझाया जाए कि इसके कितने बड़े नुकसान परिवार और समाज के हो रहे हैं। उससे शायद सुधार की आशा बनती है।

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– रवि कुमार विश्नोई
सम्पादक – दैनिक केसर खुशबू टाईम्स
अध्यक्ष – ऑल इंडिया न्यूज पेपर्स एसोसिएशन
आईना, सोशल मीडिया एसोसिएशन (एसएमए)
MD – www.tazzakhabar.com

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