बाकई परी थी धनिष्ठा, 20 माह की उम्र में पांच को दे गई जीवन

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दिल्ली रोहणी निवासी आशीष कुमार व बबीता की 20 माह की बेटी धनिष्ठा अपने छोटे जीवन में ही पांच व्यक्तियों को अपने अंगों से जीवन जीने का सुनहरा अवसर प्रदान कर गई। दुनिया की सबसे छोटी उम्र की कैडेवर डोनर वाकई में परी थी वह भगवान ने शायद यह अच्छा काम करने के लिए ही आशीष कुमार व बबीता के यहां उसे जन्म दिया और उन दोनों को यह सहासिक निर्णय करने का अवसर भी प्रदान किया जो भविष्य में औरों के लिए भी प्ररेणादायक बनेगा। भगवान छोटी बच्ची की आत्मा को शांति दे और उसके मां बापों को यह गहन दुख सहने की शक्ति प्रदान करे।
स्मरण रहे कि अब धनिष्ठा के द्वारा किये गये अंग दान जिन जिन लोगों को लगे है उनमें इसके माता पिता अपने बच्ची की छवि जीवन पर्यत्न देखते रहेंगे। अपने बच्चों से बिछड़ने का गम कोई मामूली नहीं होता लेकिन जिस साहस के साथ आशीष व बबीता ने फैसला लिया मुझे लगता है कि हमारी सरकार को अन्यों को ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित करने हेतु इन दोनों का सार्वजनिक रूप से करूणामय संवेदनशील दंपति औरों की खुशी में सुख पाने वाले इंसान के रूप में इनका सम्मान किया जाना चाहिए।
स्मरण रहे कि 20 माह की मासूम बच्ची ने जब जन्म लिया तो मां-बाप गुनगुना उठे, मेरे घर आई एक नन्ही परी। उसका प्यारा सा नाम रखा धनिष्ठा। जैसा प्यारा नाम, वैसी ही उसकी मुस्कान, जिस पर हर कई न्यौछावर था। बच्ची ने अपनों के सपनों को पंख भी लगाए। लेकिन, काल निष्ठुर निकला। बालकनी से गिरकर बच्ची का ब्रेन डेड हो गई। डॉक्टरों ने उसे बचाने का प्रयास किया, लेकिन वो वापस परी लोक चली गई। जाते-जाते वह तीन लोगों को जीवन का उपहार, तो दो लोगों की आंखों को रोशनी। मासूम बेटी को खोने के गम के बीच अंगदान का फैसला रोहिणी निवासी माता-पिता के लिए आसान नहीं था। लेकिन दिल्ली के गंगाराम अस्पताल में भर्ती दूसरे बच्चों के माता-पिता का दर्द देखकर उन्होंने अंगदान का फैसला किया। अस्पताल के डॉक्टरों का दावा है कि यह बच्ची दुनिया की सबसे कम उम्र के अंगदान करने वालों में से एक है। धनिष्ठा का जन्म एक मई, 2019 को हुआ था।
पिता आशीष कुमार का कहना है कि 8 जनवरी की शाम खेलने के दौरान वह बालकनी से गिर गई। किसी को भी पता नहीं चला कि वह किस तरह ग्रिल पर चढ़ी और फिर नीचे गिर गई। उसके सिर में गंभीर अंदरूनी चोट लगी थी। उसे गंगाराम अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे बचाने की बहुत कोशिश की। लेकिन नियति के सामने धरती के भगवान भी हार गए। 11 जनवरी को उसे ब्रेन डेड घोषित कर दिया गया। आशीष व उनकी पत्नी बबिता पर तो दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। उनके सारे सपने टूट गए। ईश्वर इतना निष्ठुर भी हो सकता है, इसका उन्हें यकीन नहीं हो रहा था। दिल के कोने से एक आवाज आती.. धनिष्ठा तो परी है.. परियां भी कहीं मरती हैं, वो तो अपने सपनों के साथ इस लोक से उस लोक तक उड़ती रहती हैं। उनके इस अहसास ने अस्पताल में भर्ती कुछ बच्चों को नई जिंदगी दे दी। अस्पताल में ऐसे बच्चे भर्ती थे, जिन्हें किडनी की जरूरत थी। उनके माता-पिता की परेशानी देखकर आशीष और उनकी पत्नी बबिता ने अंगदान का फैसला किया, ताकि दूसरे बच्चों की जान बच सके।
आशीष एक निजी कंपनी में नौकरी करते हैं, जबकि बबिता सरकारी स्कूल में शिक्षक हैं। अपनी पीड़ा से दूसरों के घर में खुशियां भरकर आशीष कहते हैं कि भले ही धनिष्ठा हमारे साथ नहीं है, लेकिन हमने सोचा कि यदि अंगदान करते हैं तो कम से कम वह कुछ लोगों के बीच किसी न किसी रूप में जिंदा रहेगी। यदि अंगदान नहीं करते तो उसके अंतिम संस्कार के साथ वह अंग भी बेकार हो जाते, जिससे दूसरों की जिंदगी बच सकती थी, इसलिए अंगदान कर बेटी को जिंदा रखने का फैसला किया। लिहाजा, दिल, लिवर, किडनी व दोनों कार्निया दान किए गए। कार्निया को अभी सुरक्षित रखा गया है। दिल अपोलो अस्पताल में पांच माह के बच्चे में प्रत्यारोपित किया गया, जिसे हृदय की जन्मजात बीमारी थी। प्रत्यारोपण के बाद बच्चा आइसीयू में भर्ती है। वहीं, लिवर यकृत व पित्त विज्ञान संस्थान (आइएलबीएस) में नौ माह के एक बच्चे में प्रत्यारोपित किया गया।
आइएलबीएस के लिवर प्रत्यारोपण सर्जन डॉ. वी पामेचा का कहना है कि जन्मजात बिलियरी एट्रेसिया बीमारी के कारण बच्चे का लिवर खराब हो गया था। उसका वजन भी मात्र साढ़े छह किलोग्राम है। डोनर बच्ची व लिवर की बीमारी से पीडित बच्चे का ब्लड ग्रुप अलग-अलग था। डोनर का ब्लड ग्रुप एबी पाजिटिव था, जबकि लिवर की बीमारी से पीडित बच्चे का ब्लड ग्रुप ओ पाजिटिव है। सामान्य तौर पर लिवर प्रत्यारोपण के लिए ब्लड ग्रुप एक होना चाहिए, लेकिन ब्लड ग्रुप अलग-अलग होने के बावजूद बच्चों में लिवर प्रत्यारोपण संभव हो पाता है। लिहाजा, इस बात की पूरी उम्मीद है कि बच्ची का लिवर बच्चे के शरीर में सामान्य रूप से काम करने लगेगा।
किडनी गंगाराम अस्पताल में 34 वर्षीय व्यक्ति को प्रत्यारोपित की गई। बच्ची की किडनी छोटी होने के कारण एक किडनी वयस्क व्यक्ति को प्रत्यारोपित नहीं की जा सकती थी, इसलिए ईएन ब्लाक किडनी प्रत्यारोपण किया गया। इस तकनीक में डोनर की दोनों किडनी महाधमनी (अयोर्टा), वेना कावा (ऑक्सीजन रहित खून का संचार करने वाली नसें) व दोनों यूरेटर सहित निकालकर मरीज में प्रत्यारोपित की जाती है।
डॉ.डीएस राणा (चेयरमैन बोर्ड प्रबंधन, गंगाराम अस्पताल) का कहना है कि बच्ची का परिवार अंगदान के लिए आगे आया, इसकी सराहना की जानी चाहिए। अंगदान की कमी के कारण देश में हर साल पांच लाख लोगों की मौत हो जाती है। यदि इस तरह परिवार अंगदान के लिए आगे आते हैं तो अनेक लोगों की जान बचाई जा सकती है।
ब्ताते चले कि हदय लीवर दोनों किडनी एवं दोनों काॅर्निया दान करने वालों को कैडेवर डोनर कहते है कि जरूरी है कि उसका ब्रेन डेड हो।
इलाज करने वाले डाक्टर अजय सहगल द्वारा भी परिवार की प्रशंसा की गई बताई जाती है। कुल मिलाकर यह कहने में कोई हर्ज महसूस नहीं होता है कि देश में दस लाख लोगों में आंकड़ों के अनुसार 26 लोग ही अंग दान करते है। लेकिन धनिष्ठा के परिवार के प्रेरणादायक निणर्य से अब इसमें और बढ़ोत्तरी होने से नहीं नकारा जा सकता। अंत में यही कहा जा सकता है कि आशीष और बबीता की 20 माह की पुत्री को भगवान ने शायद यह अच्छा कार्य करने के लिए धरती पर भेजा और वो बाकई में नववर्ष 2021 की शुरूआत में पांच लोगों की जिन्दगी उज्जवल बना गई। हम सब इस फैसले के लिए युवा दंपत्ति का आभार भी व्यक्त करते है कि पांच ही सही नागरिकों को अब पूर्ण जीवन जीने का अवसर प्रदान होगा।
धनिष्ठा प्रकरण से उन लोगों को भी सबब लेना चाहिए जो हमेशा बेटा होने की आस ही लगाये रहते है क्योंकि अब बेटियां हर क्षेत्र में पुरूषों के कंधे से कंधा मिलाकर चल ही रही है और अपने मां बापों का भी सहारा बन रही है। लेकिन 20 माह की घनिष्ठा ने तो इससे भी आगे बढ़कर काम किया है जिसके लिए पूरी मानव जाति को अपने बेटियों पर गर्व करना चाहिए।

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– रवि कुमार विश्नोई
सम्पादक – दैनिक केसर खुशबू टाईम्स
अध्यक्ष – ऑल इंडिया न्यूज पेपर्स एसोसिएशन
आईना, सोशल मीडिया एसोसिएशन (एसएमए)
MD – www.tazzakhabar.com

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