कोरोना के नाम पर बच्चों और बुजुर्गों पर अंकुश उचित नहीं है, मुख्यमंत्री जी इन्हें हर जगह आने जाने की मिले अनुमति

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कहते हैं कि बच्चे और बूढ़े दोनों एक समय में आकर सोचने और समझने के मामले में एक समान हो जाते हैं और उस समय उनकी भावनात्मक व सेवा से देखभाल परिवार के सदस्यों के लिए अत्यंत जरूरी होती है और यही समय होता है कि जब वो किसी भावना का शिकार होकर डिप्रेशन में चले जाएं या बीमारी का शिकार हो जाएं। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए उन्हें घुमाने फिराने और उनकी इच्छापूर्ति के इंतजाम किए जाते हैं। लेकिन कोरोना से बचाव के नाम पर एक प्रकार से जबरदस्ती बच्चों और बुजुर्गों को जो घर में कैद रखने की व्यवस्थाएं हो रही हैं उनसे भले ही यह दोनों कोरोना का शिकार न हो लेकिन अन्य बीमारियों का शिकार होकर समय से पहले या तो चल बस सकते हैं या परिवार के लिए बड़ी परेशानी का कारण बन सकते हैं। प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा कोविड 19 की समस्याओं के समाधान और उसके संक्रमण से बचाने के लिए बच्चों बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं व सांस के मरीजों को बीमारी होने पर होम आईसोलेशन की अनुमति ना देने के निर्देश दिए गए हैं। स्वास्थ्य विभाग ने यह योजना किस आधार पर बनाई यह तो उसके अधिकारी ही जान सकते हैं लेकिन जब से कोरोना श्ुारू हुआ है तो पिछले लगभग आठ माह में एक साल के बच्चे से लेकर 100 साल के बुजुर्ग तक ठीक होकर अपने घर लौटे हैं इसलिए उनके बाहर निकलने पर या आने जाने पर रोक लगाना ठीक नहीं है। अब रही बात होम आईसोलेशन की अनुमति देने की तो मुख्यमंत्री जी सरकारी अस्पतालों और उनक व्यवस्थाओं के बारे में इलाज करा रहे कोरोना के मरीजों की जो राय स्पष्ट होकर आ रही है उससे तो यह लगता है बुजुर्गों और बच्चों को वहां भर्ती कराया गया तो वहां इनके बचने की संभावनाएं कम हो जाती है। इसलिए होम आइसोशोलेशन की व्यवस्था हो तो बुजुर्गां और बच्चों के लिए वहीं ठीक है। अगर कुछ होता है तो अंतिम समय तक परिवार के साथ पीड़ित रह सकते हैं। आज एक खबर पढ़ने को मिली कि एक गिरजाघर में बुजुर्गो बच्चों के प्रवेश पर रोक लगी, नहीं होंगे इनके कार्यक्रम। एग्जीक्यूटिव मेंबर आगरा रीजन कांफ्रेंस ललित स्टीफन तथा सेंट थाॅमस चर्च के डीन मेरठ रेंज फादर पारितोष नाॅयल तथा पल्ली पुरोहित सेंट जोसफ द्वारा कोविड 19 के चलते यह रेाक लगाते हुए कहा गया है कि घर पर ही भेजे जाएंगे गिफट। बुजुर्गो और बच्चों के नहीं होंगे सांस्कृतिक कार्यक्रम। इनका यह कहना किस आधार पर है यह तो वही जान सकते हैं लेकिन हर समझदार व्यक्ति को यह पता है कि धार्मिक स्थान पर जाने से बच्चा हो या बूढ़ा उसका मन बदलता है और धार्मिक भावना से इच्छाशक्ति मजबूत होती है। और कोरोना से बचने के लिए यह दोनों ही चीज जरूरी है उसके बावजूद गिरजाघरों में बूढ़े और बच्चों के प्रवेश पर पुन विचार होना चाहिए क्योंकि किसी भी रूप में किसी भी व्यवस्था के तहत बच्चों और बुजुर्गों को घर में कैद किया जाना स्वास्थ्य से दृष्टिकोणा से उचित नहीं है। इसलिए मेरा मानना है कि यह सभी आदेश वापस हो और बुजुर्गों व बच्चों को कोरोनेा के नियमों का पालन करते हुए हर जगह जाने की अनुमति मिलनी चाहिए यह उनका मानवीय अधिकार भी है और समाजिक व्यवस्था की मांग भी।

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क्योकि वर्तमान में शादी ब्याह समारोह बाजारों आदि में छोटे बच्चे और बड़े बुजूर्ग बड़ी तादाद में मास्क लगाये ओर बिना लगाये नजर आते है कुछ शर्तो के साथ अन्य छूट भी दी जारही है ऐसे में बच्चों और बुजूर्गो का नाम लेकर उनका हौंसला और हिम्मत जो इस बीमारी से लड़ने के लिए वो जुटा रहे है उसे तोड़ने की बजाये उनका आत्मविश्वास मजबूत करने की जरूरत ज्यादा है और उस पर ही हम सबकों एक राय होकर आगे बढ़ना चाहिए।

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– रवि कुमार विश्नोई
सम्पादक – दैनिक केसर खुशबू टाईम्स
अध्यक्ष – ऑल इंडिया न्यूज पेपर्स एसोसिएशन
आईना, सोशल मीडिया एसोसिएशन (एसएमए)
MD – www.tazzakhabar.com

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