ऑनलाइन पढ़ाई और काम की हो अब विदाई

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कोरोना काल में अगर देखें तो व्यापार करने जीवन जीने सहित हर काम की व्यवस्था बदल गई। बच्चों की पढ़ाई ऑनलाइन शुरू हुई तो इस दौरान वर्क फ्राॅम होम का प्रचलन काफी बढ़ गया। अगर एक दृष्टिकोण से देखे तो यह अच्छा है क्योंकि बच्चों के स्कूल जाने तक खर्च होने वाला पेट्रोल डीजल बच रहा है। वहां जो अन्य खर्च होते थे उनकी बचत हो रही है। यही स्थिति विभिन्न मल्टीस्टार कंपनियों आदि में काम करने वाले कर्मचारियों व अधिकारियों के बारे में कही जा सकती है क्योंकि एक तो घर से दफ्तर तक जाने का समय बच रहा है दूसरे सड़कों पर जो आवागमन के चलते भीड़ लगती थी वो कम हो रही है। और कुछ लोग इससे परेशान हैं तो कुछ इंजाॅय भी कर रहे हैं। लेकिन सही मायनों में देखें तो यह आॅनलाइन पढ़ाई हो या दफतर का काम। दोनों ही एक प्रकार से जीवन के लिए नुकसानदायक और आराम तलबी का मुख्य कारण बन रहे हैं। तो दूसरी ओर कर्मचारी और अधिकारी कार्यों पर पूरा ध्यान भी केंद्रित शायद नहीं कर पा रहे हैं। रही बात पढ़ाई की तो इससे आॅनलाइन को लेकर भी लोगों की अलग अलग राय है। कुछ का कहना है कि इससे बच्चों की आंखों पर जोर पड़ रहा है और बच्चें स्कूल जाते हैं तो आपस में एक-दूसरे से तालमेल बैठाने और अनुशासन में रहने की प्रवृति बढ़ती है लेकिन घर पर यह संभव नहीं है।
इस काम में आॅनलाइन में फैक्टी मालिकों और स्कूल संचालकों के तो कई फायदे हैं जैसे स्कूल और क्लास की रखरखाव का खर्चा बचता है। शिक्षकों को फायदा यह है कि स्कूल नहीं जाना पड़ रहा। कुछ घंटे पढ़ाकर घर बैठे वेतन मिल रहा है और कई स्कूल तो बताते हैं कि हफ्ते में कुछ घंटे पढ़ाई करा रहे हैं और फीस पूरी ले चुके हैं। कई अभिभावकों ने इस ओर ध्यान दिलाया है कि जब पूरी पढ़ाई नहीं करा रहे हैं तो फीस पूरी क्यों ले रहे हैं। उसमें भी कमी होनी चाहिए। रही बात वर्क फा्रॅम होम की तो इस संबंध में भी काम करने वाले कुछ नौजवानों का कहना है कि घर पर पूरा काम तो कंपनी करा रही है लेकिन दफतर में आने पर जो रहने का स्थान दिया जाता है और पूरी तनख्वाह। उसमें फायदा कंपनी का ही हो रहा है क्योंकि वेतन घटा दिया गया है किराया अलग बच रहा है। इस संदर्भ में प्रसिद्ध इफोसिस कंपनी के संस्थापक श्री नारायण मूर्ति के इस कथन में भी दम है कि भारत में ज्यादातर लोगों के घर छोटे हैं जिसकी वजह से उन्हें ध्यान केंद्रित करने में दिक्कत होती है। जिससे कार्य की प्रगति और उत्पादन प्रभावित होता है। उनका यह मत भी उचित लगता है कि छोटी छोटी अवधि के लिए स्कूलों को खोला जाए। तथा कोरोना के नियमों का पालन कराकर पढ़ाई का मौका बच्चों को मिले। मेरा भी मानना है कि सरकारें एक तो कोरोना को रोकने के उपाय प्रभावी रूप से लागू कराए जिससे महामारी कम हो सके और बच्चों को स्कूल में पढ़ाई करने तथा कामगारों को फैक्टी में काम करने का अवसर मिल सके। और अगर देखें तो गरीब और मध्यम दर्जे के लोग तो रोजी रोटी कमाने के लिए बाहर निकल ही रहे हैं और उनके बच्चे भी सड़कों पर खेलते दिखाई देते हैं। इस बात को ध्यान में रखते हुए अब काम और हर बच्चे की पढ़ाई की व्यवस्था की ओर सरकार को ध्यान देना होगा।

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– रवि कुमार विश्नोई
सम्पादक – दैनिक केसर खुशबू टाईम्स
अध्यक्ष – ऑल इंडिया न्यूज पेपर्स एसोसिएशन
आईना, सोशल मीडिया एसोसिएशन (एसएमए)
MD – www.tazzakhabar.com

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